सितम्बर 2015
अंक - 7 | कुल अंक - 54
प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

समीकरण
अकसर लोग हमेशा नारी की महानता के लिए ये सोच रखते आए हैं जो सच भी है -
नारी घर की स्वामिनी, नारी घर की लाज।
नारी ने कल को जना,नारी ने ही आज।।
 
धीरे धीरे लोगो की सोच बदली नारी मुक्ति जैसी क्रान्तिकारी सोच और बदलाव ने समाज में कई आमूलचूल परिवर्तन किये,..कई तरह से सोच और सोच के साथ नारी और पुरुष के समीकरण बदले,.. नारी के अस्तित्व ने ऋण (-) से बराबर (=) और फिर धन (+) का प्रतिनिधित्व भी किया
लेकिन मुझे यही लगता है समीकरण कितने भी बदल जाएं,... मापदंड कितने भी परिवर्तित हो जाएं... समय का चक्र कितना भी आधुनिकता का लिबास ओढ़ ले,... स्त्री और पुरूष चाहे कितना भी शत्रुता, प्रतिद्वंदिता, विरोध और असहिष्णुता का प्रदर्शन करे,...प्राकृतिक नैसर्गिक और शाश्वत सत्य यही है कि ये शत्रु नही एक दूसरे के पर्याय हैं। 
 
माना नारी ने जना, सकल जगत का वंश।
पर न भूलो हर वंश में,नर का भी है अंश ।।
 
मैं यह मानती हूं यदि स्वीकार कर ली जाए एक दूसरे की पूरकता तो संघर्ष का कोई कारण ही नही है क्योंकि स्त्री और पुरुष दिन और रात की तरह एक दूसरे से बिलकुल अलग हैं तन, मन और आत्मा से तो क्या हुआ?? 
दिन और रात कभी एक दूसरे के बिना कालचक्र को पूरा कर पाए है,,...? 
स्त्री और पुरूष रच पाए है कभी अकेले किसी नई संतति को,.....? 
तो फिर ये कोई संघर्ष क्यों? 
हर बार स्त्री के स्त्रीत्व और पुरूष के पुरूषत्व का माप-तोल क्यों?
महत्व का आकलन और अस्तित्व पर प्रश्नचिन्ह क्यों?
क्यूं हम स्त्री और पुरूष के संकुचित संबोधनो को परे रख कर इंसान और इंसानियत पर मुद्दे नहीं उठाते??
 
एक और सवाल जो अक्सर मेरे मन में उठता है कि हर बार ऐसा ही क्यूँ सोचा जाए,... कि "हर स्त्री के भीतर सीता का अंश होता है,.. और हर पुरुष के भीतर कहीं रावण सोया रहता है,.."
कभी कोई क्यूं नहीं सोचता,..कि हर स्त्री में कहीं सूर्पनखा का अंश होता है,... और हर पुरुष के भीतर कहीं राम/लक्ष्मण रहता है ..."
           
मैं खुद एक नारी होने के नाते खुद से कई बार ये सवाल पूछती हूं कि कभी अबला और कभी,.. देवी बनकर,.. या फिर पुरूषों को ही दोष देकर सहानुभूति बटोरने या अपनी तरफ लोगों का ध्यान आकर्षित करने की जरुरत क्यों है? हम खुद ही अपने लिये कई ऐसे पैमाने और दायरे तय करते हैं, जो स्त्री की पुरुषों से तुलना किये जाने को मजबूर करता है जिससे हमें बाहर निकलना चाहिये।पुरुष को हमेशा ही शक की नज़र से देखने की बजाय सोच बदलनी चाहिए क्योंकि कोई भी व्यक्ति केवल अच्छा या केवल बुरा नही होता ये बात बिल्कुल सही है। और फिर हर बार हर बात को स्त्री और पुरुष के संदर्भ में वर्गीकृत किया जाए या हर बार स्त्री पुरुष को विमर्श का विषय बनाया जाए जरूरी तो नही,..? मैं और आप अपनी सोच के लिए स्वतंत्र हैं पर काश सबको ये सही लगे कि -
नारी की ही जय न हो, हो नर का भी मान।
जग में जनक जननी का,मान हो एक समान ।।
         
एक और निवेदन कि स्त्री-पुरुष विमर्श से बाहर निकल कर मानव-विमर्श की तरफ बढ़ें, आज स्त्री-पुरुष की तुलना से ज्यादा जरुरत है समाज में "मानव-विमर्श" की !

- प्रीति सुराना