महिला ग़ज़ल अंक
अंक - 40 | कुल अंक - 54
प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

ग़ज़ल-गाँव
ग़ज़ल-
 
फिर से हसीन वक़्त की बस्ती में आ गये
मेरे तमाम शेर जो सुर्खी में आ गये
 
तक़दीर सूखे पत्तों की भी क्या है दोस्तो!
थोड़े-से चरमराए और मुट्ठी में आ गये
 
ओझल हुए निगाह से दुनिया के रंजो-ग़म
मिट्टी से हम बने थे तो मिट्टी में गये
 
गुच्छे तुम्हारी याद के पहलू से टूटकर
महके हुए गुलाब की टहनी में आ गये
 
काटे गए हैं पेड़ यूँ इतने की आजकल
जंगल के सारे जीव भी बस्ती में आ गये
 
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ग़ज़ल-
 
सफ़र में क्या भरोसा हादसे का
भला क्या दोष इसमें रास्ते का
 
कहाँ दिल से कोई अब सोचता है
ये सौदा है नहीं अब फ़ायदे का
 
चलो, फिर लुत्फ़ लेते हैं अकेले
विदेशी व्यंजनों के ज़ायके का
 
बची है अब नहीं शब्दों की क़ीमत
कहाँ मतलब रहा अब वायदे का
 
बहुत थक-से गए कच्ची सड़क पर
मज़ा लेते रहे जो हाइवे का

- डॉ. भावना

रचनाकार परिचय
डॉ. भावना

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