महिला ग़ज़ल अंक
अंक - 40 | कुल अंक - 54
प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

ग़ज़ल-गाँव

ग़ज़ल-

चुराकर आपकी ख़ातिर गुलाबी फूल लाई हूँ
किसी के प्रेम की शायद मैं पहली ही रुबाई हूँ

नहीं मालूम अब तक भी उसे दरियादिली मेरी
सभी कुछ छोड़कर पीछे मैं जिसके पास आई हूँ

लिखा था, तोड़ना बिल्कुल मना है फूल क्यारी से
मगर मैं फूल-फल सारे वहीं से तोड़ लाई हूँ

कभी लगता ये गुलशन है कभी लगता ये सहरा है
ज़माने के लिये लेकिन अभी तक मैं पराई हूँ

लिली, बेला, चमेली और मैं हूँ रात की रानी
महकती जो फ़िज़ाओं में मुहब्बत की कमाई हूँ

‎ये जीवन तो उसे बस और उसको ही समर्पित है
जिसे लगती कभी अपनी कभी लगती पराई हूँ

‎सती हूँ और राधा भी कभी मीरा कभी शबरी
इकाई हूँ मगर मन से हमेशा मैं दहाई हूँ


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ग़ज़ल-

जिससे कभी भी आज तक मतलब नहीं रहा
लेकिन हमेशा से मुझे अच्छा वही लगा

घर तक मेरे वो आ गये लेकिन चले गये
जैसे किसी के द्वार पर रुकती नहीं हवा

बोला नहीं वो आज तक चुप भी नहीं रहा
उसको सुना है ध्यान से मैंने तो इस दफ़ा

डूबी उसी की नाव जो लहरों से डर गया
उतरा वही है पार जो तैराक बन गया

'तारा' किसी का दर्द तब अपना बनाइये
करती नहीं है जब असर लुकमान की दवा

 


- डॉ. तारा गुप्ता

रचनाकार परिचय
डॉ. तारा गुप्ता

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ग़ज़ल-गाँव (1)गीत-गंगा (1)