प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
महिला ग़ज़ल अंक
अंक -52

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

ग़ज़ल-गाँव

ग़ज़ल-

मेरे आँगन में कर वो सहर ज़िन्दगी
तरसी जिसके लिए उम्र भर ज़िन्दगी

चंद लम्हों के सिक्के थे बस हाथ में
ख़र्च कर दी ये हमने किधर ज़िन्दगी

खिलखिला कर हँसे, मौत के सामने
मौत के यूँ कतरती है पर ज़िन्दगी

दौड़ती फिर रही थी ये कल तक मगर
पटरी से अब गई है उतर ज़िन्दगी

इक तरफ़ ये जहां, इक तरफ़ सिर्फ़ तुम
किसने ज़्यादा छली उम्र भर ज़िन्दगी

ज़ीस्त को हम मनाते रहे ज़ीस्त भर
हमसे रूठी रही, ज़ीस्त भर ज़िन्दगी

शम्स की सख़्तियाँ हो गईं बे-असर
रब की रहमत से है तर-बतर ज़िन्दगी


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ग़ज़ल-

परेशां-सा दिखे हर आदमी है
बताता क्यूँ नहीं क्या बे-बसी है

मेरी आँखों के अाँसू पर न जाओ
झरा आँखों से मोती शबनमी है

रुला लेते हैं जी भर कर हमें जब
तो फिर कहते हैं 'ये तो दिल्लगी है'

किसी बेताब महबूबा के जैसे
नदी सागर से मिलने चल पड़ी है

बता भी दो हमें क्या बात थी वो
लबों पर आते-आते जो रुकी है

ख़ुशी का इसकी जाने क्या सबब है
समन्दर में लहर जो नाचती है

फ़लक़ पर दूर तक फैले सितारे
मगर दिल की ज़मीं पर तीरगी है


- असमा सुबहानी
 
रचनाकार परिचय
असमा सुबहानी

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