महिला ग़ज़ल अंक
अंक - 40 | कुल अंक - 54
प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

ग़ज़ल-गाँव

ग़ज़ल-

सब साथ हों तो मिलती है संसार की ख़ुशी
मिलकर रहें तो रोज़ है त्यौहार की खु़शी

ख़ुशबू के एक झोंके-सा आकर चला गया
आँखों में भर गया है वो दीदार की ख़ुशी

नफ़रत के कारोबार से मशहूर जो हुए
चेहरों पे उनके देखिये व्यापार की ख़ुशी

आए थे वक़्ते-नज़्अ मेरा हाल देखने
वो चाहते थे देखना बीमार की ख़ुशी

दिल में हज़ार ख़्वाहिशें, आँखों में ग़म लिए
हँसकर दिखा रहे हैं वो किरदार की ख़ुशी


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ग़ज़ल-

मुस्कराते हैं बस हँसी लिखकर
रेत पर छोड़ दी खुशी लिखकर

रात चुपचाप लौट जाती है
पत्ते-पत्ते पे फिर नमी लिखकर

जी उठेंगे जो मेरे मरने से
उनको आये हैं ज़िन्दगी लिखकर

अपनी किस्मत की स्याह चादर को
ओढ़ लेते हैं चाँदनी लिखकर

सबसे बेबस है कौन, लिखना था
लौट आये हैं आदमी लिखकर


- अनिता सिंह

रचनाकार परिचय
अनिता सिंह

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ग़ज़ल-गाँव (1)