प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
अगस्त 2015
अंक -52

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

अंतर्जाल पर हिंदी साहित्यिक पत्रिकाओं की स्थिति: कृष्णवीर सिंह सिकरवार

आज हिन्दी में देश से कई छोटी बडी साहित्यिक पत्रिकायें प्रकाशित हो रही है एवं इन पत्रिकाओं का पाठक वर्ग भी बहुतायत में है जो इनको खरीदता व पढ़ता है इस दृष्टि से इनकी स्थिति सृदृढ कहीं जा सकती है । इन पत्रिकाओं की लोकप्रियता का कारण यह भी है कि कम कीमत में यह पाठको तक पहुंच जाती है और इनके पाठको को खरीदकर पढ़ने मे कोई गुरेज नहीं होता है । इनकी बिक्री भी दिनोदिन संतोषजनक होती जा रही है । यह पत्रिकायें आज व्यापक रूप सें प्रकाशित हो रही है व इनका क्षेत्र फैलता जा रहा है । पाठक इन पत्रिकाओं के माध्यम से साहित्यिक क्षेत्र में हो रही घटनाओं की जानकारी व हिन्दी के प्रतिष्ठित रचनाकारों की लेखनी की जानकारी प्राप्त होती रहती है । देश मे कई पुरानी पत्रिकायें बेहतर प्रचार प्रसार के अभाव मे व पाठको का अभाव होने के कारण बन्द भी हो रही है फिर भी हिन्दी साहित्यिक पत्रिकाओ का एक अपना बाजार है जो इनको जिंदा बनाये रखे हुये है।

पत्र-पत्रिकाओ पर चर्चा करने से पहले हिन्दी पुस्तको के प्रकाशन पर कुछ रोचक तथ्यो से पाठको को अवगत कराना जरूरी है । हिन्दी में प्रकाशित पुस्तको के प्रकाशनों का कहना कि पुस्तको की बिक्री संतोषजनक नही है व इनके प्रकाशन मे जितनी लागत आती है उतना मुनाफा इनकी बिक्री से नहीं हो पाता है व हर बार नुकसान ही उठाना पडता है । इस कारण पुस्तको का प्रकाशन जोखिम का काम होता जा रहा है, कुछ हद तक यह बात सही भी हो सकती है परन्तु देश मे हर वर्ष आयोजित होने वाले पुस्तक मेले कुछ और ही नजारा बयां करते है । यह पुस्तक मेले देश मे हर वर्ष आयोजित किये जाते है जिनमे देश भर के विभिन्न प्रकाशनो के साथ-साथ विदेशों के प्रकाशन भी अपनी पुस्तको को बिक्री के लिये भाग लेते है व पुस्तक प्रेमी बडी संख्या मे भाग लेते है और अपनी पंसद की पुस्तको को खरीदते व साहित्यिक मित्रों को भेंट स्वरूप प्रदान करते है । इन मेलों मे लाखों करोडो की पुस्तको की बिक्री इस बात को पुष्ट करती है कि आज भी देश मे अच्छी पुस्तको को खरीदने वाले पाठको की कमी नही है बशर्ते उन्हे सही जगह व पुस्तको का बेहतर प्रचार प्रसार मिले तो पाठक मिल ही जायेंगे । अगर पाठको की साहित्यिक उदासीनता का प्रकाशनो द्वारा रोना रोया जाता है तो यह पुस्तक मेले देश भर मे आयोजित नही किये जाते । जिसका सबसे बडा उदाहरण दिल्ली मे प्रतिवर्ष फरवरी माह मे आयोजित होने वाले पुस्तक मेले का लिया जा सकता है जो आज भी रिकार्ड पुस्तको की बिक्री के लिये जाना जाता है और पाठको के द्वारा इसका प्रतिवर्ष इन्तजार किया जाता है । हां आज बेहतर प्रचार प्रसार के अभाव में पुस्तको की जानकारी पाठको तक पहुंच नही पाती है इस कारण अच्छी से अच्छी पुस्तके पाठको के इन्तजार मे दम तोड देती है । आज यह आवश्यक हो गया है कि पुस्तको का बेहतर तरीके से प्रचार प्रसार किया जाये तो देश मे पुस्तको को खरीदने वाले पाठको की कमी नही है । सरकार को भी ऐसे तरीके खोजने होगें जिनके माध्यम से पुस्तको की जानकारी आम पाठको तक बेहतर तरीके से पहुंच सके तभी इनकी बिक्री को संतोषजनक बनाया जा सकता है ।


इन पुस्तको की बिक्री, बढ़ी हुई कीमत के कारण भी प्रभावित होती है आज कोई भी पुस्तक उठाकर देख लीजिये कीमत उनकी ज्यादा ही मिलेगी अब अगर 50 पृष्ठ की पुस्तक की कीमत 200-250 की बीच होगी तो क्योंकर पाठक उसको खरीदेगा । अब पाठक अपनी पंसद की पुस्तक को पढ़ना चाहता है मगर ज्यादा कीमत होने के कारण खरीद नहीं पाता है इसलिये भी पुस्तको की बिक्री प्रभावित होती है इसके लिये निजी प्रकाशन व शासन को भी इस दिशा मे ठोस कदम उठाने होगें तभी पुस्तको की बिक्री संतोषजनक बनायी जा सकती है । पुस्तको की कीमत भी कम रखी जावे व ज्यादा से ज्यादा पुस्तकों को पेपरबेक में छापा जाना चाहिये जिससे पुस्तको को आम पाठक नसीब हो सके ।
इस लिहाज से लघु पत्रिकाओं की स्थिति बेहतर कही जा सकती है क्योंकि एक तो इनकी कीमत कम होती है व आसानी से यह पत्रिकायें पाठको को रेल्वे स्टेशन, बस स्टैण्ड एवं पुस्तको के स्टाल पर प्राप्त हो जाती है । अतः इन पत्रिकाओं की स्थिति पुस्तको की अपेक्षा बेहतर ही कही जा सकती है ।


आज की महंगाई मे कुछ पत्रिकाओं की बढ़ी हुई कीमत से भी इन्कार नहीं किया जा सकता है फिर भी यह एक अपवाद ही माना जावेगा । आज मंहगी पत्रिकाओ मे उज्जैन से प्रकाशित मासिक साहित्यिक पत्रिका ’’समावर्तन’’ का नाम लिया जा सकता है इस मासिक पत्रिका की कीमत 150 रूपये मासिक व वार्षिक 1500 रूपये है जो किसी भी दृष्टि से उचित नहीं है क्योंकि इतनी कीमत मे एक अच्छी पुस्तक पाठक को मिल सकती है तो वह पत्रिका क्यो खरीदना चाहेगा । लगता है इस पत्रिका का प्रकाशन अमीर पाठको के लिये किया जा रहा है आम पाठको को इसे पढने के लिये सोचना बंद करना पडेगा । इसके उलट देश मे सस्ती पत्रिका भी निकल रही है जिनकी कीमत बहुत ही कम रखी गयी है इस संदर्भ मे हिमाचल प्रदेश, शिमला से प्रकाशित मासिक पत्रिका ’हिमप्रस्थ’ का नाम लिया जा सकता है, इस पत्रिका के संपादक डॉ. आर.एस. राणा हैं। इस पत्रिका की मासिक कीमत मात्र 5 रूपये व 50 रूपये वार्षिक रखी गयी है । यह एक संपूर्ण साहित्यक पत्रिका है जिसमे सभी विचारों को समाहित किया गया है जो आम पाठक के लिये पठनीय है । हांलाकि यह शासकीय पत्रिका है फिर भी 50 पृष्ठ की यह साहित्यिक पत्रिका पाठको का भरपूर ज्ञानवर्धन कम कीमत मे करती है जो स्वागत योग्य है अतः ऐसी पत्रिकाओ का बेहतर प्रचार प्रसार किया जाना चाहिये व पाठको तक ऐसी पत्रिकाओ की जानकारी पहुंचायी जानी चाहिये ।


आज कम्प्यूटर व इन्टरनेट के युग में कुछ पत्रिकायें सीधे ही अंतर्जाल पर प्रकाशित की जा रही है यह भी एक सराहनीय कदम है क्योकि अंतर्जाल पर प्रकाशित होने से यह पत्रिकाये देश मे ही नही बल्कि विदेशों मे बैठे प्रवासी भारतीय पाठक भी आसानी से इन पत्रिकाओ को पढ़ सकते है | इस तरह से इन पत्रिकाओं के प्रकाशनो द्वारा विदेश मे भेजने का डाक खर्च भी बच जाता है जो कि काफी ज्यादा होता है और पत्रिका भी काफी समय बाद पाठको तक पहुंचती थी अब पाठको को अंतर्जाल पर प्रकाशित होने से काफी सुविधा हो गयी है तथा आराम से इन पत्रिकाओ का पढ़ा जा सकता है । इस लिहाज से अंतर्जाल पर पत्रिकाओ का प्रकाशन पाठको के दृष्टिकोण से लाभप्रद ही माना जावेगा । कुछ पत्रिकाये अंतर्जाल पर व प्रिन्ट रूप मे प्रकाशित हो रही है एवं कुछ केवल प्रिन्ट रूप में ही प्रकाशित होती है । प्रस्तुत आलेख में केवल हिन्दी की साहित्यिक पत्रिकाओ के प्रकाशन पर समुचित प्रकाश डाला गया है इस दिशा मे मैं कितना सफल हो पाया हॅू यह तो पाठक पढ़कर ही फैंसला करेंगे ।
 

केवल अंतर्जाल पर ही प्रकाशित पत्रिकाओं का संक्षिप्त वर्णन इस प्रकार हैः-
 
www.garbhnaal.com- यह प्रवासी भारतीयों की मासिक पत्रिका है जो पूर्व मे प्रिन्ट रूप में प्रकाशित की जाती रही थी परन्तु आज यह केवल अंतर्जाल पर ई-पत्रिका के रूप में ही प्रकाषित की जा रही है । यह एक साहित्यिक पत्रिका है जो मीनाल रेसीडेन्सी, भोपाल से प्रकाशित होती है इस पत्रिका में हिन्दी की दशा व दिशा के साथ-साथ, उसके स्वरूप व उसके विकास को प्रमुखता के साथ प्रकाशित किया जाता है । धार्मिक चर्चाये भी इस पत्रिका की एक प्रमुख खूबी है जिसमे पाठको के समक्ष रामायण, महाभारत, गीतासार आदि से संबंधित विभिन्न रचनाकारो के विचार प्रमुखता से रखे जाते है । इस पत्रिका के संपादक श्री आत्माराम शर्मा साहित्य की इस बहुरंगी यात्रा के लिये बधाई के पात्र है जो इतनी बढिया साहित्यिक पत्रिका पाठको तक पहुंचाते है । इस लिंक पर पत्रिका के प्रथम प्रकाशन (नबंवर 2006) के बाद से वर्तमान अंक तक पी.डी.एफ. फाइल के रूप में संजोकर रखे गये है । पाठक नये अंको के साथ-साथ पुराने अंको को भी देख व पढ़ सकता है इस लिहाज से यह एक सराहनीय कदम है ।
www.apnimaati.com- यह पत्रिका भी ई-पत्रिका के रूप में चित्तौढगढ राजस्थान से प्रकाशित की जाती है यह एक साहित्यिक विधा की पत्रिका है जिसमे हिन्दी साहित्य के प्रत्येक कोण को प्रमुखता के साथ दर्शाया जाता है | इस पत्रिका के संपादक श्री अशोक जमनानी हैं । इस पत्रिका के पुराने अंक भी इस लिंक पर दिये गये है जो पठनीय है ।
www.rachnakar.org- यह विष्व की पहली यूनीकोडित हिन्दी की सर्वाधिक प्रसारित ई-पत्रिका है जिसमे पत्रिकाओं के साथ-साथ रचनाकारो की रचनायें सीधे इस साइड के जरिये प्रकाषित की जाती है । इस पत्रिका मे आलेख, कहानी, कविताये, उपन्यास, गजले, चुटकुले, बालकथायें, व्यंग्य, समीक्षायें, लघु कथायें, कहानी संग्रह आदि सामग्री को प्रमुखता के साथ संकलित किया जाता है । इस लिंक को पाठको द्वारा देखा जाना उचित होगा।
 

अंतर्जाल और प्रिन्ट रूप में प्रकाशित पत्रिकाओं का वर्णन इस प्रकार हैः-
www.bhavans.info- यह हिन्दी की डाइजेस्ट मासिक साहित्यिक पत्रिका है जो भारतीय विद्या भवन, क0मा0मुंषी मार्ग, मुम्बई से हर माह प्रकाशित होती है इस पत्रिका के संपादक विश्वनाथ सचदेव है । यह पत्रिका प्रिन्ट रूप व अंतर्जाल दोनो ही रूपों मे प्रकाशित की जाती है । यह भी हिन्दी की साहित्यिक पत्रिका है जिसमे सभी विचारों का स्वागत किया जाता है । पत्रिका पठनीय है । पत्रिका का मासिक शुल्क 30 रूपये है जो किसी भी लिहाज से इतनी अच्छी हिन्दी की साहित्यिक पत्रिका के लिये ज्यादा नहीं है । पत्रिका मे नाटक, साहित्यिक समाचार एवं आवरण कथा के अन्तर्गत सारगर्भित सामग्री पाठको को दी जाती है जो कि उच्चस्तरीय होती है । बेवसाइट पर नये व पुराने अंको को पाठको के लिये सुरक्षित रखा गया है जिसे आसानी से देखा व पढ़ा जा सकता है ।
www.hindisamay.com- यह महात्मा गांधी अन्तराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय, वर्धा, महाराष्ट्र की बेवसाइट है, इस बेवसाइट पर प्रत्येक सप्ताह साहित्यप्रमियों के लिये कुछ न कुछ नया साहित्य जोड़ा जाता रहता है । इस लिंक पर पाठक विश्वविद्यालय की जानकारी व उसकी गतिविधियों की समस्त जानकारी को आसानी से देखा व पढा जा सकता है । विश्वविद्यालय ने अपनी इस वेबसाइट पर उपन्यास, कविता, कहानी, व्यंग्य, नाटक, निबंध, आलोचना, विमर्श, बालसाहित्य, विविध, समग्र संचयन, अनुवाद, हमारे रचनाकार, हमारे लेखक, संग्रहालय आदि अनुक्रम के तहत हिन्दी साहित्य की अमूल्य धरोहर को संजोकर रखा है जो किसी भी पाठक के लिये बहुमूल्य सामग्री हो सकती है ।


संग्रहालय के तहत विश्वविद्यालय ने हिन्दी के विभिन्न वैश्विक रचनाकारो की पाण्डुलिपियां, उनके पत्र, पत्रिकाओ में प्रकाषित उनकी रचनाऐं आदि को रखा गया है जो किसी भी पाठक का ध्यान अपनी ओर आकर्षित करती है । विश्वविद्यालय इन विभिन्न गतिविधियों के साथ-साथ तीन पत्रिकाओं का प्रकाशन भी करता है जिसमें पहली है- ’बहुवचन’ अंतर्राष्ट्रीय त्रैमासिक हिन्दी पत्रिका, इस पत्रिका के संपादक-अशोक मिश्र है । पत्रिका में कहानियां, कविताऐं, संस्मरण, यात्रा वृतान्त एवं आलोचना आदि से संबंधित सामग्री इसकी पहचान होती है । पत्रिका ने कई विशेषांकों का भी प्रकाशन किया है जो पाठको के बीच अत्यधिक लोकप्रिय हुये थे । पत्रिका ने वरिष्ठ आलोचक व चितंक डा0 रामविलास शर्मा पर आधारित विशेषांक, कहानी विशेषांक (अक्टूबर-दिसबंर 2013 अंक) एवं हिन्दी फिल्मो के सौ साल के सफर पर विशेष विशेषांक प्रकाशित किया है जो पाठको के लिये बहुमूल्य साबित हो सकता है । दूसरी पत्रिका है- ’पुस्तक-वार्ता’ द्वैमासिक समीक्षा पत्रिका, इस पत्रिका के द्वारा विभिन्न पुस्तको की समीक्षा के साथ-साथ आलोचना, कविता, कहानी, साक्षात्कार, कला संस्कृति, हस्तक्षेप, हिन्दी विमर्श, संस्मरण आदि के तहत पठनीय सामग्री प्रकाशित की जाती है । इस पत्रिका को उच्चस्तरीय पत्रिका बनाने मे इसके संपादक भारत भारद्वाज के योगदान को भुलाया नहीं जा सकता है जिन्होने अपने श्रम से इस पत्रिका को नई ऊँचाई पर पहुंचाया । फिलहाल इस पत्रिका के संपादक राकेश श्रीमाल जी है, आशा की जानी चाहिये कि वे भी पत्रिका के कलेवर को बनाये रखने मे कोई कसर नही छोडेगे । एवं तीसरी पत्रिका है- ’हिन्दी लैग्वेज डिस्कोर्स राइटिंग’ यह त्रैमासिक अंग्रेजी की पत्रिका है इस अंग्रेजी पत्रिका की संपादिका विद्वान लेखिका ममता कालिया जी है इस पत्रिका मे वैश्विक रचनाकारो की शार्ट स्टोरी, बुक रिव्यू, डिस्कोर्स, लैंग्वेज आदि के तहत स्तरीय सामग्री प्रस्तुत की जाती है जो अंग्रेजी मे पढने वाले पाठको के लिये उपयोगी सिद्ध हो सकती है । अतः इस पत्रिका को भी पाठको द्वारा देखा जाना उचित होगा । इन तीनों पत्रिकाओं के पुराने अंक ’आर्काइव’ के तहत व वर्तमान समय के अंक ’वर्तमान’ के तहत रखे गये है जो विश्वद्यालय का एक महत्वपूर्ण कार्य है । प्रिन्ट रूप मे खरीदने के लिये पाठको को ’हिन्दी लैग्वेज डिस्कोर्स राइटिंग’ त्रैमासिक अंग्रेजी की पत्रिका के लिये 110 रूपये मासिक व 400 रूपये वार्षिक, ’पुस्तक-वार्ता’ द्वैमासिक समीक्षा पत्रिका के लिये 20 रूपये द्वैमासिक व 120 रूपये वार्षिक, ’बहुवचन’ अंतर्राष्ट्रीय त्रैमासिक हिन्दी पत्रिका के लिये 50 रूपये त्रैमासिक व 200 रूपये वार्षिक कीमत चुकानी पडेगी ।


www.prernamagzine.com- यह समकालीन लेखन के लिये साहित्यिक एवं सामयिकी की त्रैमासिक पत्रिका है जो भोपाल से प्रकाशित होती है इस पत्रिका के संपादक श्री अरूण तिवारी जी है जो पत्रिका मे सारगर्भित सामग्री पाठको को उपलब्ध करवाते है । इस पत्रिका मे सारगर्भित आलेख, कवितायें, पुस्तक चर्चाये, लघुकथाये, कहानी आदि के तहत बहुत ही ज्ञानवर्धक जानकारी पाठको को प्राप्त होती है । इस पत्रिका का प्रिन्ट रूप मे त्रैमासिक शुल्क 20 रूपये और वार्षिक 100 रूपये है । इस पत्रिका के कुछ पुराने अंक पत्रिका की बेवसाइट पर डाले हुये है हालांकि बेवसाइट को कई महीनो से अपडेट नहीं किया गया है जिस कारण नये अंको को जानकारी बेवसाइट पर प्राप्त नहीं हो पा रही है |
www.indiaculture.nic.in- यह संस्कृति मंत्रालय भारत सरकार की बेवसाइड है इस पर मंत्रालय स्वयं की विभिन्न गतिविधियों की जानकारी के साथ-साथ ’संस्कृति’ नामक सांस्कृतिक विचारों की प्रतिनिधि अर्द्धवार्षिक पत्रिका का भी प्रकाशन करता है । जो पाठको को भारत की विभिन्न संस्कृतियों से परिचय कराता है । इस पत्रिका के संपादक भारतेश कुमार मिश्र है । यह पत्रिका पहले त्रैमासिक प्रकाशित की जाती थी और भारत सरकार द्वारा इसकी केवल 400 प्रतियां मुद्रित करवायी जाती थी । बीच मे यह पत्रिका कुछ समय के लिये बंद कर देनी पडी थी | इसके बाद अक्टूबर 2000 से इस पत्रिका का पुनः प्रकाशन किया गया । इस बार पत्रिका को छःमाही कर दिया गया । अब इस पत्रिका की 3000 प्रतियां मुद्रित करवायी जाती है जो देश के लगभग समस्त विश्वविद्यालयों, पुस्तकालयों, लेखको, देश-विदेश के सुविख्यात विद्वानों को निःशुल्क उपलब्ध करवायी जाती है । इस पत्रिका की विभिन्न विशेषताओं के साथ-साथ यह भी एक विशेषता है कि यह पत्रिका पूर्णतः निःशुल्क है कोई भी पाठक इस पत्रिका को मंगा सकता है । चूंकि इसकी सीमित प्रतियां ही मुद्रित की जाती है, इसलिये पाठको की मांग पर सीमित संख्या में यह पाठको तक पहुंच पाती है । परन्तु मंत्रालय ने अपनी बेवसाइट पर इस पत्रिका के अब तक के प्रकाशित समस्त अंको को पी0डी0एफ0 फाइल के रूप में डाला है जिसे कोई भी पाठक उपरोक्त बेवसाइट पर जाकर देख सकता है । इस पत्रिका के द्वारा देश के विभिन्न कालजयी व्यक्तियों पर विषेषांको को प्रकाषित किया गया है । जिनमे रविन्द्रनाथ ठाकुर विशेषांक, जवाहरलाल नेहरू विशेषांक आदि काफी लोकप्रिय हुये थे, इसके अलावा संग्रहालय विद्या विशेषांक, पुस्तकालय विशेषांक एवं हाल ही मे इस पत्रिका का कश्मीर विशेषांक प्रकाशित हुआ है जो ज्ञानवर्धक व पठनीय है । किसी भी पाठक के लिये यह विशेषांक ऐतिहासिक धरोहर से कम नही है अतः इन विशेषांको को पाठको द्वारा देखा जाना उचित होगा ।


www.hansmonthly.in- यह हिन्दी साहित्य के महान कथाकार मुंशी प्रेमचंद द्वारा स्थापित अपने समय की महत्वपूर्ण पत्रिका रही है । मुंशी प्रेमचंद की मृत्यु के बाद इस पत्रिका का प्रकाशन प्रेमचंद के पुत्र अमृतराय ने किया था | इधर यह पत्रिका कई वर्षो से बंद थी । उस समय हिन्दी के प्रसिद्ध कथाकार श्री राजेन्द्र यादव जी ने प्रेमचंद के जन्मदिवस यानी 31 जुलाई 1986 से इस प्रसिद्ध पत्रिका का अक्षर प्रकाशन, नई दिल्ली से पुनः एक मासिक पत्रिका के तौर पर प्रकाशन शुरू किया है तब से यह पत्रिका अनवरत् रूप से पाठको तक अपने अमूल्य साहित्यिक विचारों के तौर पर प्रस्तुत हो रही है जिसमे साहित्य की समस्त विधाओ को स्थान दिया जाता है । यह पत्रिका अपने स्वतंत्र विचारो के साथ-साथ श्री राजेन्द्र यादव के संपादकीय के लिये भी जानी जाती रही जिसे हर पाठक पंसद करता रहा है और अपनी प्रतिक्रियाऐं भी देता रहा है । इस पत्रिका ने नये रचनाकारो की रचनाओं को प्रमुखता से मौका दिया जिस कारण देश के कोने-कोने मे फैले अनगिनत रचनाकारों की रचनाओ से पाठको का परिचय हुआ । चूंकि यादव जी के देहावसान् के कारण पत्रिका के कलेवर पर प्रभाव पडना लाजिमी है फिर भी उम्मीद की जानी चाहिये कि पाठको को पूर्व की तरह ही पत्रिका मे विचारोत्तेजक सामग्री मिलती रहेगी ।
पत्रिका मे राजनीति, कला संगीत, टी0वी0 चैनल, साक्षात्कार, नाटक एवं कहानियां आदि से संबंधित सामग्री को प्रमुखता के साथ संपादित किया जाता है । प्रिन्ट रूप मे इस मासिक पत्रिका का मूल्य 30 रूपये मासिक व 350 रूपये वार्षिक है । बेवसाइट पर पिछले कई सालो से कार्य नहीं किया जा रहा है इस कारण नये अंको की जानकारी उपलब्ध नहीं है ।
rsaudr.org- यह राजस्थान साहित्य अकादमी उदयपुर की मासिक पत्रिका है इस पत्रिका के प्रबंध संपादक डा0 प्रमोद भट्ट है । पत्रिका मे विभिन्न विषयों पर आधारित आलेखों के साथ-साथ साक्षात्कार, परिचर्चा, कहानियां एवं अनुवाद से संबंधित सामग्री को प्रस्तुत किया जाता है जो पठनीय है । प्रिन्ट रूप मे पत्रिका का मासिक शुल्क 10 एवं वार्षिक 120 रूपये है जो साहित्यिक दृष्टिकोण से उचित एवं सही है । पत्रिका की बेवसाइट पर नये अंको के साथ-साथ पुराने अंको को भी रखा गया है जो देखे जाने योग्य है ।


www.kathabimb.com- यह पत्रिका मुंबई से प्रकाशित होती है जिसके संपादक डा0 माधव सक्सैना ’अरविन्द’ है । बेवसाइट पर पत्रिका को पेेननण्बवउ के माध्यम से प्रकाशित किया जाता है । बेवसाइट पर पत्रिका के नये व पुराने अंको को सजाकर रखा गया है जिसे पाठको द्वारा देखा जाना उचित होगा । इस पत्रिका का प्रिन्ट रूप में मासिक शुल्क 15 व वार्षिक 200 रूपये है ।
www.parikathahindi.com- यह समय और समाज की परिक्रमा है । पत्रिका द्वैमासिक रूप में नई दिल्ली से प्रकाशित होती है । पत्रिका के सलाहकार संपादक वरिष्ठ आलोचक व चिंतक डा0 नामवर सिंह जी है जिससे पत्रिका के कलेवर का अंदाजा पाठक सहज ही लगा सकते है । वर्तमान मे संपादक पद का भार श्री शंकर संभाल रहे है । अभी पत्रिका के युवा जीवन पर आधारित अंक प्रकाशित किये जा रहे है जो युवा पाठको के बीच बहुत लोकप्रिय हो रहे है । पत्रिका अपनी स्तरीय सामग्री के कारण पाठको के बीच अति लोकप्रिय है । बेवसाइट पर पत्रिका के नये पुराने अंको को संभालकर रखा गया है जो पठनीय है । इस द्वैमासिक पत्रिका के एक अंक की कीमत 40 रू0 व बारह अंकीय सदस्यता की कीमत 300 रू0 है ।
www.bharatiyabhasaparishad.com- साहित्य और संस्कृति की यह मासिक पत्रिका कोलकाता से प्रकाशित होती है जिसके संपादक एकान्त श्रीवास्तव व कुसुम खेमानी है । पत्रिका मे साहित्य की विभिन्न विधाओ जैसे-कहानी, कविता, गीत, गजल आदि के साथ कथा साहित्य के तहत विचारोत्तेजक सामग्री प्रस्तुत की जाती है जो पठनीय है । इस पत्रिका का प्रिन्ट रूप में मासिक शुल्क 20 व वार्षिक 200 रूपये है । पत्रिका की बेवसाइट पर वर्ष 2013 के समस्त अंक पी.डी.एफ. फाइल के रूप मे पाठको को उपलब्ध कराये गये है ।


www.vartmansahitya.com- साहित्य, कला और सोच की यह मासिक पत्रिका है जो अलीगढ से प्रकाशित होती है इस मासिक पत्रिका के संस्थापक संपादक श्री विभूति नारायण राव व संपादक नमिता सिंह है । पत्रिका मे सभी विषयों पर आधारित सामग्री प्रकाषित होती है जिनमे कहानियां, लघुकथायें, पुस्तक समीक्षाऐं, कविताऐं, गजले, सांस्कृतिक समाचारों आदि के साथ विभिन्न विषयों पर देख के लोकप्रिय रचनाकारो के विचार प्रकाशित किये जाते है जो ज्ञानवर्धक व पठनीय होते है । पत्रिका का कलेवर अच्छा है इस पत्रिका का प्रिन्ट रूप में मासिक शुल्क 20 व वार्षिक 230 रूपये है । पत्रिका की बेवसाइट पर वर्ष 2013 के समस्त अंक पी0डी0एफ0 फाइल के रूप मे पाठको को उपलब्ध कराये गये है । जिसे कोई भी पाठक आसानी के साथ पढ सकता है ।
www.veenapatrika.com- राष्ट्रभाषा हिन्दी एवं साहित्य के मूल्यों के मूल्यों को समाज तक पहुंचाने के उद्देश्य से वर्ष 1927 मे पत्रिका ’वीणा’ का प्रकाशन प्रारंभ किया था तब से यह पत्रिका निरंतर प्रकाशित हो रही है इस पत्रिका को आरंभ से देश के कालजयी रचनाकारों की लेखनी का सहयोग प्राप्त होता रहा है । पूर्व प्रधानमंत्री श्री अटल बिहारी वाजपेयी जी भी युवावस्था मे ’वीणा’ के लेखक रहे है । ’वीणा’ के शोधपरक लेख छात्रों के लिये काफी उपयोगी साबित होते है । अभी तक ’वीणा’ का संपादन सोलह महान विभूतियों द्वारा किया गया है वर्तमान मे इसके संपादक श्री डा0 विनायक पाण्डेय है । इस पत्रिका के अब तक विभिन्न अवसरो पर 30 विशेषांक प्रकाषित हो चुके है । वर्तमान मे यह पत्रिका मध्यप्रदेश के इन्दौर जिले से प्रकाशित हो रही है इस मासिक पत्रिका मे साहित्य की अमूल्य धरोहरो के समाहित किया जाता है जो पढ़ने योग्य होती है । इस पत्रिका का प्रिन्ट रूप में मासिक शुल्क 20 व वार्षिक 200 रूपये है । पत्रिका की बेवसाइट पर नये व पुराने अंको को पी.डी.एफ. फाइल के रूप मे पाठको के लिये रखा गया है ।


www.lamahihindipatrika.blogpost.in- इस ब्लागपोस्ट पर हिन्दी साहित्य की एक और शुद्ध त्रैमासिक साहित्यिक पत्रिका ’लमही’ का प्रकाशन किया जाता है । यह पत्रिका गोमती नगर, लखनऊ से प्रकाषित होती है इसके संपादक विजय राय है । पत्रिका मे आलोचनात्मक आलेखों को प्रमुखता के साथ प्रकाशित किया जाता है जो किसी भी शोधार्थी के लिये लाभप्रद हो सकते है । इस ब्लॉगपोस्ट पर पत्रिका के लगभग समस्त अंको को पी0डी0एफ0 फाइल के रूप मे पाठको के लिये रखा गया है । पत्रिका के शिवमूर्ति विशेषांक व कहानी विशेषांक पाठको द्वारा विशेष रूप से सराहे गये । इस पत्रिका का प्रिन्ट रूप में मासिक शुल्क सामान्य अंक के लिये 15 व आजीवन सदस्यता 1000 रूपये रखी गयी है । पत्रिका पिछले छः वर्ष से निरन्तर प्रकाशित हो रही है जो कि एक उत्साहजनक कदम है ।
www.pragatisheelvasudha.blogpost.in- यह पत्रिका भी ब्लागपोस्ट पर प्रकाषित की जाती है,  पत्रिका मध्यप्रदेश, भोपाल से प्रकाशित होती है । इस पत्रिका के संस्थापक संपादक श्री हरिशंकर परसाई जी रहे है व वर्तमान मे इसके संपादक स्वयं प्रकाश व राजेन्द्र शर्मा है, जो अपनी बेहतरीन संपादन से इस पत्रिका का कलेवर खूबसूरत बनाये हुये है । पत्रिका में आलोचनात्मक आलेखों के साथ-साथ कविताऐं, कहानी, पुस्तक चर्चाऐं, सामयिकी आदि के तहत बेहतरीन जानकारी पाठको को उपलब्ध करवायी जाती है । इस ब्लॉगपोस्ट पर पत्रिका के नये पुराने अंको को पी0डी0एफ0 फाइल के रूप मे पाठको के लिये रखा गया है । इस पत्रिका का प्रिन्ट रूप में मासिक शुल्क 50 व वार्षिक 250 रूपये है ।


www.vibhom.com- इस बहुआयामी पत्रिका की संपादिका डा0 सुधा ओम ढींगरा है, जो खुद एक पत्रकार, कहानीकार, स्टेज कलाकार, उपन्यासकार व टी.वी. आदि के क्षेत्र मे विषेष रूप से सक्रिय रही है और आज प्रवासी साहित्यकार के रूप में हिन्दी प्रचारिणी सभा कनाडा से प्रकाशित अन्तर्राष्ट्रीय त्रैमासिक पत्रिका ’’हिन्दी चेतना’’ के रूप में हिन्दी की बहुमूल्य सेवा कर रही है । पत्रिका मे भारतीय प्रवासी साहित्यकारो की रचनाओ के साथ-साथ भारतीय रचनाकारो की रचनाओं को भी प्रमुख रूप से पत्रिका मे स्थान मिलता है । पत्रिका के माध्यम से पाठको को साहित्य की समस्त गतिविधियों से रूबरू कराया जाता है जो सुधाजी की उत्कृष्ट संपादकीय की एक मिसाल है । पत्रिका की बेवसाइट पर जुलाई 2009 से अब तक के सभी अंक पी0डी0एफ0 फाइल के रूप में पाठको को मिलेगें । इस पत्रिका का मूल्य 5 डालर रखा गया है । उल्लेखनीय है कि पत्रिका के परामर्ष मण्डल मे भारत के विख्यात आलोचक, प्रेमचंद साहित्य विशेषज्ञ डा0 कमल किशोर गोयनका जी का पत्रिका को उत्कृष्ट बनाने में महत्वपूर्ण योगदान है व पद्मश्री विजय चोपडा भारत, पूर्णिमा बर्मन शारजाह, अफरोज ताज अमेरिका, निर्मला आदेष कैनेडा, विजय माथुर कैनेडा आदि प्रवासी रचनाकारों का योगदान भी पत्रिका को नई उंचाईयों पर पहुंचाने में उल्लेखनीय है ।


samvadiahindipatrika.blogpost.in- इस त्रैमासिक पत्रिका का प्रकाषन संवदिया प्रकाशन, अररिया, बिहार द्वारा कोसी अचंल के वरिष्ठ कवि कथाकार श्री भोला पंडित ’प्रणयी’ के प्रधान संपादन में अक्टूबर 2004 से नियमित रूप से हो रहा है । पत्रिका मे गजल, कविताये, आलेख, पुस्तक समीक्षाऐं, कहानी और संस्मरण आदि के तहत बहुत ही लाभप्रद सामग्री पाठको को दी जाती है जो पठनीय है । पत्रिका की बेवसाइट पर पिछले सभी अंको को पाठको के लिये सुरक्षित रखा गया है । प्रिन्ट रूप में इस पत्रिका का त्रैमासिक मूल्य 25 रू0 व वार्षिक 100 रू0 है ।
www.pakhi.in- इस मासिक पत्रिका का प्रकाशन गौतमबुद्ध नगर, उत्तरप्रदेश से किया जा रहा है एवं वर्तमान मे पत्रिका के संपादक श्री प्रेम भारद्वाज है । पत्रिका मे कविताये, शोध आलेख, लघुकथायें, रपट, परिचर्चा, संस्मरण, पुस्तक समीक्षाऐं,  आदि के तहत बहुत ही ज्ञानवर्धक सामग्री पाठको को दी जाती है जो पठनीय है । यह पत्रिका सितम्बर 2008 से नियमित प्रकाशित हो रही है एवं अभी तक पत्रिका वरिष्ठ कथाकार राजेन्द्र यादव, डा0 नामवर सिंह, ज्ञानरंजन और संजीव पर विशेषांक प्रकाषित कर चुकी है । इन विशेषांको को साहित्य जगत् की अपार सराहना मिली । पत्रिका की बेवसाइट पर सितम्बर 2008 से जनवरी 2013 तक के सभी अंको को पाठको के लिये सुरक्षित रखा गया है । प्रिन्ट रूप में इस पत्रिका का मासिक मूल्य 30 रू0 व वार्षिक 350 रू. है।
pakhimagazine.blogpost.in- इस ब्लागपोस्ट पर पाखी के जनवरी 2013 के बाद के अंको के केवल आवरण चित्र एवं अनुक्रम के रूप मे इस ब्लागपोस्ट पर रखे गये है । पत्रिका मे संकलित विशेष आलेखो को पाठको के लिये उपलब्ध करवाया गया है जिसे देखा जाना उचित होगा । आशा की जानी चाहिये कि भविष्य में पत्रिका के बेवसाइट समन्वयक पाठको के लिये सम्पूर्ण पत्रिका भी उपलब्ध करवायेंगे ।


 निष्कर्षतः उपरोक्त अवलोकन के माध्यम से हम यह बखूवी अंदाजा लगा सकते है कि आज आधुनिकता की दौड़ में पत्रिका को देश व विदेशों मे बैठे लाखो करोड़ों पाठको तक पत्रिका की पहुंच हो इसके लिये देश की छोटी से छोटी व बड़ी से बड़ी पत्रिकाओं का प्रकाशन पत्रिकाओ के संपादको द्वारा बेवसाइट पर किया जा रहा है जो कि एक लाभप्रद प्रक्रिया है । इस प्रक्रिया के तहत देश के ही नहीं बल्कि विदेशों के पाठको को भी पत्रिका पढने को मिल जाती है एवं पत्रिका अत्यधिक पाठको तक पहुंचने के कारण लोकप्रिय भी होती है । उपरोक्त आलेख मे केवल हिन्दी साहित्य मे ही प्रकाशित प्रमुख-प्रमुख पत्रिकाओ का विवरण दिया गया है । चूंकि आज देश मे हजारो की संख्या मे छोटी बडी पत्र-पत्रिकाये प्रकाशित होती है जिनका सम्पूर्ण विवरण स्थानाभाव के कारण संभव नहीं था । पाठक इसको अन्यथा न लेगे ऐसी उम्मीद करता हॅू । दिये गये विवरण के द्वारा पाठक पत्रिकाओ को खरीदकर व इनकी बेवसाइट पर विजिट कर इनको देख व पढ़ सकते है अगर किसी साहित्य प्रेमी को इस लेख के द्वारा लाभ हुआ तो मुझे अत्यधिक खुशी होगी।


- कृष्णवीर सिंह सिकरवार