प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
महिला ग़ज़ल अंक
अंक -53

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

आलेख

बनारस की हिन्दी ग़ज़ल और मंजरी पाण्डेय
- डॉ. लवलेश दत्त



बनारस के मूलनिवासी डॉ. विनय मिश्र ने समकालीन हिन्दी ग़ज़ल संग्रह 'बनारस की हिन्दी ग़ज़ल' के नाम से संपादित किया है। इस संग्रह में न केवल बनारस के ग़ज़लकारों और उनकी ग़ज़लों का संग्रह है बल्कि बनारस में हिन्दी ग़ज़ल के बीज का अंकुरण, पल्लवन और पुष्पित होने की ऐतिहासिक गाथा को देश के जाने-माने आलोचक डॉ. जीवन सिंह के द्वारा लिपिबद्ध किया जाना इस पुस्तक के लिए उपयोगी सिद्ध हो गया है। प्रस्तुत ग़ज़ल संग्रह में कबीर से लेकर आज तक के उन सभी ग़ज़लकारों के संक्षिप्त परिचय के साथ उनकी दस-दस प्रतिनिधि ग़ज़लों का संकलन है, जो आज भी बनारस की धरती पर हिन्दी ग़ज़ल की परम्परा को आगे बढ़ाने का प्रयास कर रहे हैं। इसी संग्रह की ग़ज़लों को पढ़ते हुए मेरा परिचय सुश्री मंजरी पांडेय से हुआ।

मंजरी पाण्डेय इस ग़ज़ल संग्रह की एकमात्र महिला ग़ज़लकार हैं। स्त्री मन और प्रेम की गहरी संवेदनाओं को स्वर देने वाली मंजरी जी अपनी ग़ज़लों में भोगे हुए प्रेम के नाना रूपों को चित्रित करती हैं। प्रिय का आकर्षण उससे मिलने को विवश कर देता है और प्रियतम उससे मिलने के लिए कहीं भी जाने को तत्पर रहता है। मंजरी जी लिखती हैं—


सुना है ख़ास लोगों से कि तुमको भा गई हूँ मैं
यही तो सोचकर मिलने यहाँ पर आ गई हूँ मैं


प्रिय से मिलने और उसकी एक झलक पाने के बाद प्यासा मन तृप्त हो जाता है, मानो उसे सबकुछ मिल गया हो—

यहाँ आने से पहले मेरा दामन ख़ाली ख़ाली था
तेरे पहलू में आकर आज सबकुछ पा गयी हूँ


प्रेम का असर ऐसा होता है कि व्यक्ति कभी हँसता है तो कभी रोता है। उसे यह सारा संसार असार नज़र आता है। मंजरी जी की भी यही स्थिति है—

हमें क्या हुआ जो अभी हँसते-हँसते
अभी आँसुओं में नहाने लगे हैं


मंजरी जी यह बात जानती हैं कि सच्चा प्रेम भी भाग्य से मिलता है और यदि भाग्य प्रबल है तो रूठे हुए लोग भी मान जाते हैं—

ये किस्मत है मेरी, मेरे दिन फिरे तो
जो रूठे थे वे ही मनाने लगे हैं


जीवन सुख और दुख का संगम है। कभी सुख तो कभी दुख आते जाते रहते हैं। सुख के दिनों में सदैव प्रसन्न रहने वाला मन दुख की पीड़ा से विचलित भी हो उठता है—

बढ़ गई ज़िन्दगी में इस क़दर ये पीर
भर गईं आँखें हमारी और छलके नीर


ऐसे में मुश्किलें पर्वत के समान दिखाई देतीं हैं, लेकिन इन्हीं मुश्किलों को पार करने वाला मनुष्य ही साहसी कहलाता है, जिसे मंजरी जी भी मानती हैं—

मुश्किलों का एक परबत ही इसे समझो
सामने जो पार करनी है मुझे प्राचीर


नारी जीवन की यह विडम्बना है कि उसे बहुत कुछ सहन करना होता है लेकिन उसकी इस सहनशीलता का जब कोई लाभ उठाने लगे तो उसे अपना मुँह बन्द नहीं रखना चाहिए। मंजरी जी भी यही कहती हैं—

कब तलक मुँह बंद करके मैं रहूँगी दोस्त
सोचती हूँ क्या यही है वक्त की तासीर


कबीर ने बहुत पहले कहा था 'प्रेमी ढूँढ़न मैं चला प्रेमी मिला न कोय' आज इसी बात को मंजरी जी कुछ इस तरह से कहती हैं—

माँगी कहाँ-कहाँ से मुहब्बत की रोशनी
अपना ही दिल जला तो उजाला लगा मुझे


सच ही है जब तक स्वयं न भीगो, पानी की शीतलता का अंदाजा नहीं हो सकता क्योंकि जीवन के सत्य को वही अभिव्यक्त कर सकता है जिसने उसे भोगा हो, जिस पर सुख-दुख दोनों आए हों और वह दोनों में अपरिवर्तनीय रहा हो—

जीने का इसके साथ कोई सिलसिला हुआ
इतना हसीन दर्द का रिश्ता लगा मुझे


मंजरी जी ने अपनी ग़ज़लों में जिस प्रेम को अभिव्यक्त किया है, वह आत्मिक प्रेम है। शारीरिक रूप से एक-दूसरे का होने से कहीं अधिक आत्मा में बसने की चाह है, कुछ-कुछ मीरा जैसे प्रेम की अभिव्यक्ति मंजरी जी ने दी है। वे तो प्रियतम की आँखों में बस जाना चाहती हैं—

अपनी आँखों में मुझको बसा लीजिए
अपने घर का कभी तो पता दीजिए


वे तो प्रिय का पवित्र स्पर्श मात्र चाहती हैं, ठीक वैसा स्पर्श जैसा राम ने शिला रूपी अहिल्या को देकर उसका उद्धार किया था। ऐसी पावन प्रेम की प्यास मंजरी जी की ग़ज़लों में देखने को मिलती है। वे कहती हैं—

राम ने भी छुआ एक पत्थर कभी
आप छूकर मुझे भी जिला दीजिए


इस संसार में हर प्राणी एक मुसाफिर की तरह है। यहाँ से हर एक को खाली हाथ ही जाना है। मंजरी जी इस दार्शनिकता और जीवन के सत्य को उजागर करते हुए कहती हैं—

मंजरी तुम हो मुसाफिर ये तेरा परदेस
लड़ झगड़कर जीत लोगी कौन-सी जागीर


इस मतलबी संसार में व्यक्ति कभी-न-कभी स्वयं को बहुत अकेला महसूस करता है। ऐसे अकेलेपन में केवल वही याद आता है जिससे उसने सबसे ज्यादा प्यार किया हो, ऐसे में मंजरी जी भी अपने उस अज्ञात प्रियतम को पुकारती हैं—

आप तन्हाइयों से इधर आइए
दिल की गहराइयों में उतर जाइए


और एकान्त जब असहनीय हो उठता है तो वे पुकारती हैं—

मंजरी अब सहा नहीं जाता
ऐसे हालात बस चले आओ


मंजरी जी हिन्दी ग़ज़ल को भली-भाँति समझती हैं। वे मुश्किलों से बाहर निकलने का मार्ग भी जानती हैं, उनका मानना है कि भले ही नारी आज विभिन्न प्रकार की समस्याओं में फँसी है लेकिन उसे हिम्मत करके उन समस्याओं से धीरे-धीरे बाहर निकलना होगा, तभी नारी सशक्तिकरण जैसी उक्तियाँ सत्य सिद्ध की जा सकेंगी—

ख़ुद को कितना बदलें हम
थोड़ा-थोड़ा सँभलें हम
फूलों तक जो जाना है
काँटों से तो निकलें हम


वे कमज़ोर होकर रोने-धोने में विश्वास नहीं करतीं, तथा जीवन को हँसकर बिताने की बात कहती हैं—

इस रोने धोने के बीच
थोड़ा-सा तो हँस लें हम


मंजरी जी की ग़ज़लें नारी मन की सशक्त अभिव्यक्ति करती हैं। वे पवित्र प्रेम की उपासना करती हैं तथा वे प्यार को पूज्य मानकर उसे नमन करने की बात कहती हैं। उनके अनुसार जीवन की समस्याओं से मुक्ति का मार्ग केवल प्रेम है। वे भारतीय संस्कृति में आस्था रखती हैं और मानव मूल्यों के प्रति सजग हैं। वे युगों से संघर्ष करती नारी के दुखों और पीड़ाओं की अभिव्यक्ति के साथ-साथ उसकी मुक्ति का मार्ग भी खोजती हैं। उनकी ग़ज़लों की भाषा आम बोलचाल की भाषा है, जो सहज ही पाठकों के हृदय में बस जाती है। मंजरी जी एक सशक्त महिला ग़ज़लकार हैं जिनका स्वर प्रेम से होता हुआ आम जीवन की पीड़ा को गाता है तथा प्रेम में विलीन हो जाता है। आज के समय में ऐसी ग़ज़लों और ग़ज़लकारों की आवश्यकता है।


- डॉ. लवलेश दत्त
 
रचनाकार परिचय
डॉ. लवलेश दत्त

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