अगस्त 2015
अंक - 6 | कुल अंक - 53
प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

हिन्दी की दूत काव्य परम्परा का एक और रत्न

हिन्दी साहित्य में महाकवि सूर से आरम्भ हुई भ्रमर गीत/भ्रमर दूत या उद्धव-शतक परम्परा संबंधी दूत काव्य अब तक मुक्तक काव्य की श्रेणी में ही स्थान पाते रहे हैं किन्तु कवि कमलाकर ’कमल’ रचित 'भावात्मक उद्धव-शतक' का संगठन कुछ इस प्रकार निबद्धित है कि इसे मुक्तक मान लेना इसके साथ अन्याय होगा क्योंकि इसका 1. कथानक मार्मिक, प्रभावी व रोचकता लिए है। श्री कृष्ण द्वारा उद्धव को संदेश हेतु ब्रज गमन व निर्गुण संदेश की कथा बहुचर्चित व भाव प्रवण है। यह महाभारत महाकाव्य के एक देश का भी एक अत्यन्त मार्मिक व प्रभावी अंश है। 2. इस अंश में पात्र सीमित तथा उनके चरित्र संक्षेप में प्रकट होते हैं। इन पात्रों में श्री कृष्ण उच्च वंशी नायक हैं। अन्य पात्रों में गोपी, ब्रज बनिताएँ, नन्द, यशोदा, राधा, कुब्जा व उद्धव इत्यादि हैं।


प्रबंधकाव्य में किसी एक रस की अपेक्षा किसी उदात्त भाव का चरम उत्कर्ष दिखाकर पाठक को मुग्ध कर दिया जाता है।1  इस आधार पर इस काव्य में सगुण भक्ति का उदात्त भाव प्रेम द्वारा उत्कर्ष तक पहुँचाया गया है, साथ ही राष्ट्रीयता, नैतिकता व श्रम शक्ति का उपदेश पाठकों में उत्साह भाव पैदा करने में सफल हुआ है तथा पाठकों के रोम, हर्ष से भर देता है। उदाहरण दृष्टव्य है-
‘‘वीरता के वर्म कौ, भरोसौ धारि भाखत है,/गैरन कौ बैरन बाट उठ जायगौ।
जग में हमारी दृढ़ धर्म निरपेक्षता सौं,/व्यापक अधर्मन कौ हाट उठ जायगौ।।"2


यह ब्रजवासी आधुनिक युगीन हैं जो श्रम बल पर अवलम्बित हैं, किसी अलौकिक सत्ता के भरोसे नहीं-
"भाग्य कौ भरोसौ धरि, हिम्मत न दैहे तोरि,/नाहिं घिघिहैये कहूँ पेट भरि लैहैं हम।
छकिकैं छठी के दिन दूध जननी कौ पियौ,/श्रम तौ कठोर ते कठोर करि लैहैं हम।
काहू पे न जैहैं पराधीनता न गैहै,/द्वारा खड़ी दीनता भलेई वरि लैहैं हम।"3


गोपियाँ घनस्याम की चातकी हैं, वे उद्धव के ब्रह्म रसायन का स्वाद तक चखना नहीं चाहती। प्रेम की एकनिष्ठता व दृढ़ता का यह संवाद बड़ा ही मार्मिक है-
‘‘आस अभिलास बिसवास बस जीवेंगी/ब्रह्म की रसायन कौ, स्वाद तुम लेहु आयौ।
चातकी इहाँ तो घनस्याम रस पीवेंगी।।"4


यह ब्रजमण्डल ही विरहाग्नि में नहीं दह रहा अपितु भक्त वत्सल गोपाल भी ब्रज की याद में अश्रु बहा रहा है-
‘‘गोकुल के प्रेम की कहानी कहि आवत ना/ऊरध उसाँस ह्वै हिय ते कढि़ जात है।
स्याम जू की पानी भरी नैंन पुतरीन माहिं,/डोल डोल गोल गोल, मोती गढि़ जात है।"5


कमलाकर के इस उद्धव-शतक में सभी पात्रों के भावावेग की निर्झरणी में पाठक भी बह जाता है, यह अपने-आप में अपने शीर्षक को सार्थकता प्रदान करता है।    
इसी क्रम में खण्डकाव्य हेतु भावानुकूल छन्द योजना का महत्त्व विचारणीय है।6 कथा व भाव की अबाध गति हेतु एक ही छन्द भी उत्तम हो सकता है। इसमें छन्द सर्गबद्धता के नियम भी शिथिल होते हैं। भावात्मक उद्धव-शतक वर्णिक छन्द मनहरण कवित अर्थात् घनाक्षरी में अपनी पूरी भाव व्यंजना प्रस्तुत करता है। जो कथा के मार्मिक अंश की अनुभूति में सहायक सिद्ध हुआ है तथा इसकी कथा चार खण्डों में विभक्त है। जिनमें पूर्वापर सम्बंध का पर्याप्त निर्वहन हुआ है। काव्य का आरम्भ मंगलाचरण से हुआ है। इसमें कुल 120 छन्द हैं, इसमें भी पूर्व पाँच छन्दों में सर्वप्रथम विनती में अपने पूर्वज कलानिधि महाकवि पद्माकर तथा जगन्नाथ दास रत्नाकर के प्रति श्रद्धा व आभार व्यक्त किया है। तदोपरान्त श्री कृष्ण के प्रति समर्पण पर एक कवित्त है। इन छः पदों को कवि ने कथा में गण्य नहीं किया है। इसका समर्पण अपने आप में नवीन व मौलिक उपमा लिए है। अब तक हंस का उपमान मिलता है परन्तु यहाँ मनोरथ-बतक कहकर अर्थ में नवीनता प्रस्तुत की है।

‘‘पुरौई भरोसौ है, तिहारौ घनस्याम हमैं,/क्यौंहूं सरनागत की, होत ना हतक है।
कहै कमलाकर सनेह के सरोवर में,/पूरौ सुख पावत मनोरथ-बतक है।


इसी क्रम में खण्डकाव्य के उद्देश्य की चर्चा में इस काव्य का प्रभाव महाकाव्य के समान महत्, गहन और युगान्तर व्यापी नहीं होता क्योंकि खण्डकाव्य का उद्देश्य उपदेश होता है और महाकाव्य का संदेश। उपदेश काल सापेक्ष होता है और संदेश सनातन और मानवता व्यापी होता है। इस आधार पर इस उद्धव शतक का उपदेश काल सापेक्ष तो है ही साथ ही यह मौलिकताओं से परिपुष्ट भी है। इसकी कथा को पूर्वापर संबंध में नियोजित कर, नवीन उद्भावनाओं ने इसे अलग ही पहचान दी है। जैसे गोपियों का श्री कृष्ण से अटूट प्रेम है परन्तु ब्रज महिलाएँ उसे अपना भाई कहती हैं-
‘‘भैया मन मोहन हमारे हम मोहन की,/बहनें सहेली सब कीरत, किसोरी की।’’

‘‘आखिर तौ जनम, मनुष्य कौ लियौ है हम,/जनम मनुष्य हू के, काम सबै आँयेंगी।’’


एक ओर ब्रजवासी उद्धव से राष्ट्रीयता व श्रम बल की बात गर्व से कहते हैं तो दूसरी ओर इनका ब्रह्म और इस काव्य का नायक भी मनुष्यता जन्म को निभाने हेतु कटिबद्ध है। कृष्ण, उद्धव से कहते हैं कि उनका अवलम्ब दैव पर न होकर कर्म पर है। वह धर्म निरपेक्षता का पक्षधर है। उद्धव द्वारा यह कहने पर कि ‘तुम्हारे मन में व्यर्थ के विकार न हों अपितु परमार्थ के उत्तम विचार होने चाहिए। मैंने तो निर्गुण ब्रह्म साधना द्वारा चित्त की स्थिरता प्राप्त कर ली है। तब कृष्ण अपने कर्तव्य व दृढ़ संकल्प उद्धव सम्मुख प्रस्तुत करते हैं-
‘‘चाहै मथुरा में रहैं, चाहै रहैं द्वारिका में,/एक पकरी है बान, आन नाहिं भूलि हैं।
कहै कमलाकर कदापि कर्म मारग में,/धर्म निरपेक्षता कौ ज्ञान नाहिं भूलि हैं।

यौंई नाहिं हमकौं जहान जस देत ऊधौ,/करिकै महान श्रम, मोहन कहात हम।’’


उपर्युक्त विश्लेषण के आधार पर कह सकते हैं कि भ्रमर गीत परम्परा का यह काव्य अपने आप में हिन्दी साहित्य का नवीन काव्य-पुष्प है, जिसकी सुरभि व रुप-रंग से हिन्दी जगत निश्चय ही लाभान्वित होगा। इस काव्य की विशेषता यह है कि इसमें पूर्व परम्परा से भिन्नता व शिल्प की मौलिक उद्भावनाएँ इसके रसास्वादन में अधिक सहायक हुई हैं। जैसे अब तक के भ्रमर गीत काव्य में निर्गुण पर सगुण की विजय ही प्रमुख अभिप्रेत रहा, जिसे कवियों ने विरह द्वारा उत्कर्ष तक पहुँचाया परन्तु इसमें  कवि ने विप्रलम्भ श्रृंगार के साथ वीर रस को भी पर्याप्त स्थान दिया है।
इसके तृतीय खण्ड में ब्रजवासी, ब्रज बनिताएँ, राधिका, यशोदा व नन्द बाबा के वचनों द्वारा कवि ने परमार्थ, राष्ट्रीयता, स्वाधीनता, नैतिकता, मनुष्यता आदि की स्थापना कर इसकी परम्परा को नवीन मोड़ दिया है। यहाँ राष्ट्र धर्म सर्वोपरि है, मात्र भक्ति नहीं। माँ यशोदा अपने लाड़ले के लिए विरह वत्सला होते हुए भी उसका संदेश देखिए-

‘‘जननी जसोमति के दूध की सपथ तुम्हें,/देस कौ महत्त्व मत भूलियो कन्हाई तुम।’’

कवि कमलाकर ‘कमल’ के ये ब्रजवासी उनके व्यक्तित्व के बिना अधूरे रह जाते। स्वयं कवि मोहन (कृष्ण व महात्मा गांधी ) में आस्था रखते हैं, परन्तु भक्ति से भी बढ़कर राष्ट्र भक्ति व मानवता का मूल्य इन्हें प्रिय है। यह ब्रजभाषी स्वतंत्रता संघर्ष करते भारतीयों को साकार कर देते हैं-
‘‘मोहन के कर्म मैं, स्वनिष्ठा उर राख राखी,/मरम विहीन कहूँ बोलत न बानी हम।

सत्याग्रह धरम हमारौ हम हिंसक ना,/आपने प्रसंसक ना, नाहिं अभिमानी हम।
देस की प्रतिष्ठा कौ, प्रभाव भरौ पानी लियै,/ जनम मनुष्यता, निभायवे की ठानी हम।’’


सूरदास की गोपियाँ भावप्रवण व अपने सगुण हित में एकनिष्ठ हैं, नन्ददास की गोपियाँ सम्पूर्ण शास्त्र विज्ञा तथा तर्क प्रवण है; जगन्नाथदास ’रत्नाकर’ की गोपियाँ भी पावन प्रेम के उछाह का अनूठा उदाहरण हैं, वहीं कमलाकर ’कमल’ की गोपियाँ प्रेम मूल्य के साथ राष्ट्रीयता धर्म परायण और रूढि़वादिता को त्यागती वैज्ञानिक दृष्टिकोण लिए हैं।
कमलाकर की कीरत किसोरी विरहाग्नि में दह रही है, परन्तु कृष्ण को जो संदेश उसने दिया है मानो हरिऔध जी की राधा से भी दो कदम आगे प्रस्तुत हुई है-

‘‘धरम निभायवे की धार, धुन धीरज सौं,/ विमल विवके धार, आछे काम कीजियो।
प्रेम पुरुषारथ के, मग कौ समर्थक है,/ पग जो उठायौ ताहिं, पाछे मत दीजियो।
ऊधौ! कह दीजियो हमारे मन मोहन सौं,/कीरत किसोरी कौ, विचार मत कीजियौ।’’


भावात्मक उद्धव-शतक भाव एवं शिल्प में विभिन्न नवीन उद्भावनाओं के साथ भी ब्रज भाषा के माधुर्य से पाठक को सराबोर कर देता है। अलंकारों की योजना सहज समाविष्ट है। कवि को उपमा, रुपक व उत्प्रेक्षा अधिक प्रिय हैं। प्रकृति मुख्य रुप से उद्दीपन रुप में व्यक्त हुई है। एक ही मनहरण कवित्त में सभी ऋतुओं द्वारा विरह दाह की अभिव्यंजना मनोहारी बन पड़ी है-
‘‘उर में निदाध लिये, आवती इतै तैं उतै,/धावती हैं आँखन पै पावस प्रचण्ड लै।
सरद सरीर पै, हिमन्त पग हाथन पै,/छावतीं उसासन पै, सिसिर उदण्ड लै।
विरह वियोग कौ बसंत बगरावती है,/मुख पै कराहवे की, आदत अखण्ड लै।।"


काव्य में आवश्यकतानुसार लोकोक्ति व मुहावरों का प्रयोग भी भाव ग्रहण में सहयोगी बना है-
‘‘कहै कमलाकर, पुरातन पै धूर डारौ,/थोथे मतवादन कौ, पाठ ना पढ़ाइये।।

‘‘पत्थर तैं पानी के कढ़ैया वे कन्हैया ऊधौ।

‘‘दूसरेई बल सौं परायी फूंक फैंकत हौ,/छकिकैं छटी के दिन दूध जननी कौ पियौ।।

‘‘ऐसी कौंन घूंँटी ताकि कण्ठ माँहि डारि हौ।।


इस उद्धव-शतक का प्रत्येक छन्द एक अलग विषय व पूर्ण अर्थ का द्योतक है परन्तु इसके खण्डों के शीर्षक में पूर्वापर संबंध अंतर्निहित है। अधिसंख्य पद ऐसे हैं जिनका भाव पाठक समझ सकता है परन्तु वह कथन किसका है? यह उसके शीर्षक और खण्ड के ज्ञान से ही प्राप्त होगा। इसकी पुष्टि इस बात से होती है कि भावात्मक उद्धव-शतक के प्राक्कथन में एक स्थान पर आधुनिक राजनीति के भावबोध हेतु जो उदाहरण यह कहकर प्रस्तुत किया है कि ‘‘उद्धव-शतक की गोपिकाएँ जब स्वदेश प्रेम की बात करती हैं तो परम्परित काव्य की इस रचना में अनायास ही आधुनिक राजनीति भावबोध का समावेश हो जाता है’’-
‘‘प्रानन तैं अधिक हमारो, हमैं देस प्यारौ,/ नैकहूं हमकौं दुलारो, देस द्रोह ना।

देस की प्रतिष्ठा को प्रभाव, भरौ पानी लियैं,/जनम मनुष्यता निभायवे की ठानी है।’’


जबकि यह पंक्तियां ब्रजवासी शीर्षक में 57, 58 छन्द में ब्रजवासियों द्वारा कथित हैं ना कि गोपिकाओं द्वारा। मेरा यह बताने का मन्तव्य सिर्फ इतना है कि प्राक्कथन के लेखक ब्रजभाषा व हिन्दी के प्रसिद्ध साहित्यकार डाॅ. विष्णु चन्द्र पाठक को इस उद्धव-शतक के अनेक छंद कण्ठस्थ हैं और वे इन्हेें ब्रज भाषा कार्यक्रमों में मंत्रमुग्ध होकर सुनाते रहे हैं, फिर भी यह पता लगाना तब ही सम्भव है जब इस काव्य के शीर्षक व खण्ड पाठक को ध्यान रहें।


भावात्मक उद्धव-शतक की पृष्ठभूमि में हिन्दी के विद्वान श्री पुरूषोत्तम उत्तम ने एक स्थान पर कहा है- "इस उद्धव-शतक में एक सौ बीस छन्द हैं, यह मुक्तक काव्य है" परन्तु इसके अगले वाक्य में ही वे मेरी बात की पुष्टि भी कर देते हैं- "इसे इस क्रम से गुम्फित किया गया है कि प्रबंध का सा आनन्द आता है। कथा इस तरह आगे बढ़ती है कि किसी भी छन्द को हटाने से कुछ व्यतिरेक-सा अनुभव होने लगता है।....इस काव्य की भाषा और छन्द अवश्य पुरातन रीतिकालीन छवि लिए हुए हैं परन्तु इसका संदेश नूतन है। हालांकि इसकी कथावस्तु भी भक्तिकालीन है लेकिन भारत राष्ट्र की विदेश नीति और घरेलू अर्थनीति....स्पष्ट  दिखलाई देती है। इसमें वियोग की प्रधानता है।"
अतः हिन्दी साहित्य मनीषियों से मेरा यही निवेदन है कि भावात्मक उद्धव-शतक एक मुक्तक काव्य परम्परा में होकर भी प्रबंध खण्डकाव्य श्रेणी का अप्रतिम काव्य है जो अब तक हिन्दी पाठ्यक्रम में समाविष्ट उद्धव-शतक परम्परा के काव्यों से भी आगे का भावबोध युगीन संदर्भ, नूतन कलेवर व नवीन उद्भावनाओं  को अभिव्यक्त करने वाला है। वस्तुतः हिन्दी साहित्य अध्येताओं एवं विद्यार्थियों को इससे परिचित कराना निश्चित ही लाभकारी सिद्ध होगा।





सन्दर्भ-
1. भारतीय एवं पाश्चात्य काव्यशास्त्र, डाॅ. सत्यदेव चौधरी एवं शांति स्वरुप गुप्त, पृ.363
2. भावात्मक उद्धव-शतक, कमलाकर कमल, पृ. 48
3. भावात्मक उद्धव-शतक, कमलाकर कमल, पृ. 47
4. भावात्मक उद्धव-शतक, कमलाकर कमल, पृ. 34
5. भावात्मक उद्धव-शतक, कमलाकर कमल, पृ. 04
6. भारतीय एवं पाश्चात्य काव्यशास्त्र, डाॅ. सत्यदेव चैधरी एवं शांति स्वरुप गुप्त, पृ. 366







समीक्ष्य पुस्तक: भावात्मक उद्धव-शतक
समीक्षक: डाॅ. सीता शर्मा 'शीताभ'
कवि: कमलाकर ‘कमल‘
संस्करण:    1990
मुल्य: पु.सं. 50/- वि.सं.30/-
प्रकाशन:    साहित्य सदावर्त प्रकाशन समिति, जयपुर


- डॉ. शीताभ शर्मा