प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
जुलाई 2015
अंक -52

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

पद
तू भी हो जा योगी
 
मन रे तू भी हो जा योगी।
दे संदेश जगत को ऐसा, रहे न कोई रोगी।।
माला जपे न करे तपस्या, बने न यह जग ढोंगी।
केवल प्राणायाम करे नित, हो तेरा सहयोगी।।
जो चाहेगा तुझे मिलेगा, चाहत पूरी होगी।
सतगुरु दे यह सीख जगत को, योगी हो हर भोगी।।
चलो विभा कर लो योगासन, हरदम स्वस्थ रहोगी।
मन योगी हो जाये, सत्वर, प्रभु के चरण गहोगी।।
 
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योग बडा गुणकारी
 
मन रे योग बडा गुणकारी।
तू अपना ले इसको तो हो, कभी न तेरी हारी।।
देता यह सबको नव जीवन, जन-जन का हितकारी।
लाभ प्राप्त करते हैं इससे, रोगी और व्यभिचारी।।
शरण चला जा तू सतगुरु की, जो हो यों उपकारी।
बिना दक्षिणा माँगे देवें, तुझको विद्या सारी।।
संयम-नियम, धर्म की देवें, शिक्षा बारी-बारी।
सांस-सांस में लिख दें जग की, प्रभु की महिमा न्यारी।।
जब तक जग में रहे विभा तू, जीवन जी सुखकारी।
सतगुरु जब आलोक बिछायें, धो ले सब अँधियारी।।
 
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कर ले प्राणायाम
 
भाई रे, कर ले प्राणायाम।
हर दु:ख का उपचार यही है, यही अनोखा बाम।।
मत दे दोष जगत को पगले, कर न इसे बदनाम।
दु:ख ही दु:ख मिलते गर तुझको, है तू ही नाकाम।।
बैठे-बैठे जीना चाहे, करे न कोई काम।
कैसे चले यंत्र इस तन का, करे न तू व्यायाम।।
राग द्वेष, आलस से होगा, तेरा काम तमाम।
बिन बरखा बादल छायेंगे, होगी दिन में शाम।।
चल दे तू सतगुरु के पथ पर, जा उनके ही धाम।
विभा बतायेंगे वे तुझको, कहाँ मिलेंगे राम।।
 
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देख रे मन अपना दर्पन
 
देख रे मन अपना दर्पन।
धूल चढ़ी जो इसे साफ कर, हो प्रभु का दर्शन।।
जिस तन के भीतर तू रहता, उसमें लगे व्यसन।
इन्हें दूर करने को जग का, काम न आये धन।।
पा जायेगा मुक्ति जगत से, करले रे योगासन।
तेरे साथ चलेगा तेरा, यद्यपि लघु है तन।।
विलोमनुलोम कपाल भारती और मयूरासन।
जो सिखलायें सतगुरु तुझको, सीख उसे रे मन।।
सतगुरु देंगे तुझको उज्ज्वल, ऐसा एक रतन।
उनके पथ पर चले विभा तो, मिलें तुझे भगवन।।

- विजयलक्ष्मी विभा
 
रचनाकार परिचय
विजयलक्ष्मी विभा

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