जुलाई 2015
अंक - 5 | कुल अंक - 53
प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

लघुकथाएँ
लघुकथा- साक्षात्कार
 
दफ़्तर के बाहर आज बड़ी भारी भीड़ थी। आज यहाँ एक क्लर्क के पद हेतु साक्षात्कार होना था। कई उम्मीदवार आज सुबह से ही दफ़्तर के बाहर तांता लगाए खडे. थे। साक्षात्कार के तय समय से दो घण्टे देर से बड़े साहब आए और आते ही चपरासी रामदीन को चाय लाने का आदेश दिया।
चाय वगैरह की आवभगत से निवृत होकर बड़े साहब ने आधा घण्टा आराम किया और फिर साक्षात्कार प्रारम्भ किया।
“मे आई कम इन सर”  के एक विनम्र सम्बोधन के साथ एक उम्मीदवार अंदर आया और बड़े साहब ने उसे कुर्सी पर बैठने का इशारा किया।
 
बड़े साहबः आपका नाम?
उम्मीदवार: जी, राजबीर........ राजबीर सिंह।
बड़े. साहबः आपकी शैक्षणिक योग्यता?
उम्मीदवार: जी, एम. कॉम. और कम्पयूटर में एक वर्षीय डिप्लोमा।
बड़े साहबः क्या आपको कोई अनुभव है?
उम्मीदवार: जी, अभी तक तो कोई अनुभव नहीं है।
बड़े साहबः किसी मन्त्री से जान-पहचान है?
उम्मीदवार: जी, मन्त्री से तो नहीं, एक विधायक से थोड़ी जान-पहचान है?
 
हूं..हूं...हूं....बड़े साहब ने कुछ सोचते हुए कहा। ओ. के. मिस्टर राजबीर। आप जा सकते हैं। अगर आपका नाम योग्यता सूची में आता है तो आपको बुला लिया जाएगा। ये सुनकर उम्मीदवार कमरे से बाहर आ गया। बड़े साहब ने घण्टी बजाकर दूसरे उम्मीदवार को अंदर बुलाया और उससे भी वही रटे-रटाये प्रश्न पूछ लिए जो पहले उम्मीदवार से पूछे थे। यही क्रम बारी-बारी से चलता रहा और एक-एक करके सभी उम्मीदवारों का साक्षात्कार ले लिया गया।
इतने में बड़े साहब को मन्त्री जी का फोन आया। उन्होंने अपने किसी रिश्तेदार की सिफारिश की, जो किसी वजह से साक्षात्कार में उपस्थित नहीं हो पाया था। बड़े साहब ने कागज पर मन्त्री जी के रिश्तेदार का नाम लिखा और ‘‘यू डोंट वरी सर......इटस ऑल राइट" कहते हुए फोन रख दिया।
 
साक्षात्कार खत्म हो चुका था। सभी उम्मीदवार घर वापिस जा रहे थे, इस उम्मीद के साथ कि शायद योग्यता सूची में उनका नाम आ जाए। कुछ दिनों के बाद साक्षात्कार का परिणाम निकला और मन्त्री जी के रिश्तेदार का नाम योग्यता सूची में आ गया और उसे नौकरी मिल गई। बाकी उम्मीदवारों को अभी भी आस है कि शायद योग्यता सूची में उनका नाम आ जाए।
 
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लघुकथा - अहसास
 
सुधीर की पत्नी मालती की डिलीवरी हुए आज पांच दिन हो गए थेl उसने एक बच्ची को जन्म दिया था और वह शहर के सिविल हॉस्पिटल में एडमिट थीl सुधीर और उसके घर वालों ने बहुत आस लगा रखी थी कि उनके यहाँ लड़का ही पैदा होगाl सुधीर की माँ मालती का गर्भ ठहरने के बाद अब तक कितनी सेवा और देखभाल करती आई थीl मगर नियति के आगे किसका वश चलता हैl आखिर लड़की पैदा हुई और उनके खिले हुए चेहरे मायूस हो गयेl सुधीर तो इतना निराश हो गया था कि डिलीवरी के दिन के बाद, वो दोबारा कभी अपनी पत्नी और बच्ची से मिलने हॉस्पिटल नहीं गया थाl
 
सुधीर आई.पी.एच. विभाग में सहायक अभियन्ता के पद पर कार्यरत थाl उस रोज वह दफ्तर में बैठा थाl उसके ऑफिस में काम करने वाला चपरासी रामदीन छुट्टी की अर्जी लेकर आयाl कारण पढ़ा तो देखा कि पत्नी बीमार है और देखभाल करने वाला कोई नहीं हैl डॉक्टरों ने भी जवाब दे दिया थाl इसीलिए रामदीन 15 दिन की छुट्टी ले रहा थाl सुधीर ने पूछा कि तुम्हारा बेटा और बहू तुम्हारी पत्नी की देखभाल नहीं करते? यह सुनकर रामदीन खुद को रोक न सका और फफक-फफक कर रोने लग गयाl सुधीर ने उसकी दुखती रग पर हाथ रख दिया थाl उसकी आँखों से निकलने वाली अश्रुधारा ने सुधीर को एक पल के लिए विचलित कर दियाl
 
रामदीन बोला, "साहब,अपने जीवन की सारी जमा पूंजी मैंने बेटे की पढाई पर खर्च कर दीl सोचा था कि पढ़-लिख कर कुछ बन जाएगा, तो बुढ़ापे की लाठी बनेगाl मगर शादी के छः महीने बाद से ही वह अलग रहता हैl उसे तो यह भी नहीं मालूम की हम लोग जिन्दा हैं या मर गयेl ऐसा तो कोई बेगाना भी नहीं करता, साहबl काश ! मेरी लड़की पैदा हुई होती तो आज हमारे बुदापे का सहारा तो बनतीl इतना कहकर रामदीन चला गयाl सुधीर ने उसकी अर्जी तो मंजूर कर ली मगर उसके ये शब्द कि "काश! मेरी लड़की पैदा हुई होती", उसे अन्दर तक झकझोरते चले गयेl एक वो था, जो लड़की के पैदा होने पर खुश नहीं था और दूसरी ओर रामदीन लड़की के ना होने पर पछता रहा थाl
 
सुधीर सारा दिन इसी कशमकश में रहाl कब पांच बज गये, उसे पता ही नहीं चलाl छुट्टी होते ही वह ऑफिस से बाहर निकला और उसके कदम अपने आप ही सिविल हॉस्पिटल की तरफ बढ़ने लगेl
मैटरनिटी वार्ड में दाखिल होते ही उसने अपनी पांच दिन की नन्हीं बच्ची को प्यार से पुचकारना और सहलाना शुरू कर दियाl मालती सुधीर में अचानक आये इस परिवर्तन से हैरान थीl अपनी बच्ची के लिए सुधीर के दिल में प्यार उमड़ आया थाl वह आत्ममंथित हो चुका था और उसे अहसास हो गया था कि एक लड़की जो माँ-बाप के लिए कर सकती है, एक लड़का वो कभी नहीं कर सकताl उसे रामदीन के वो शब्द अब भी याद आ रहे थे कि काश ! मेरी लड़की ......l

- मनोज चौहान

रचनाकार परिचय
मनोज चौहान

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