नवम्बर 2017
अंक - 32 | कुल अंक - 55
प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

संस्मरण
हीरा
 
अत्यंत गौरवर्णीय व सुदर्शन, कृश किंतु मजबूत देहयष्टि, होंठों को ढंकती श्वेत मूछें, कानों की ओर छोटी होती जातीं बडी बडी आंखें, गले में चांदी का हंसुलीनुमा कड़ा, पैरों में चमरौधा, धोती के ऊपर अंगरखा, गले से लिपटा श्वेत दुपट्टा जो एड़ियों तक पहुंचता था और सरपर फेंटा। 
यह सांगोपांग वर्णन है हीरा दादा का! तीन बार फिर चेक कर लिया है, कुछ छूटा नहीं है, निश्चय ही!!
फ़िल्म 'मुझे जीने दो' के सुनील दत्त आ गए न आंखों के सम्मुख? बस, बस...ठीक कल्पना की है. वही!
अब ये 'हीरा' दादा, न तो कोई फ़िल्मी हीरो/चरित्र हैं, न किसी डाकू की बात कर रहा हूँ मैं....
मित्रों, ये मेरे दादा थे रिश्ते में....
मेरी दादी के सगे बडे भाई!
पितामह के साले साहब!
मेरे पिता के मामा!
इन भाई-बहिन के चेहरों में इतनी समानताएं थीं कि अपरिचित भी समझ जाते इनका रिश्ता। पहली बार जब दर्शन हुए इनके, अपने घोड़े पर सवार हो, खेतों की ओर निकल रहे थे। कंधे पर लटकी पीतल के बट वाली राइफल देख आश्चर्य भी हुआ था। पता चला, बंदरों ने उत्पात मचा रखा था खेतों में; यह उनकी खातिर ले रखी थी। शाम को लौटने पर उनसे बात करने को मिला, तो फिर चकित होना पडा! इतने रौबदार शरीर की, आवाज बडी मीठी थी। मेरी दादी की आवाज से, बस जरा भर भारीपन लिये। 
फिर उन्हें अपनी बहिन से बतियाते देख लगा, नाम 'हीरा', शरीर 'जवाहर', स्वर 'मक्खन', और दिल 'मोम' है 'हीरा' दादा का!
 
स्वयं से लगभग पंद्रह वर्ष छोटी बहिन को अपने अंक से लगाते हुए, आंखों से बहते आंसुओं को रोकने या छुपाने के किसी प्रयास का, कहीं कोई चिह्न न था उनके निकट। मुख से स्वर नहीं निकल पा रहे थे. मेरी दादी का नाम 'गोदावरी' था। वे केवल नाम लेते जा रहे थे उनका;
"गोदा....गोदा....गोदा!"
दादी को लिपटाए, निरंतर केवल उनका नाम लिये जा रहे थे। आंखों से आंसुओं की अनवरत वर्षा जारी थी। मेरी कद में अत्यंत छोटी दादी, अपनी आंखें मूंदे उनकी छाती से लगी अश्रु ढाले जा रही थी और बाकी सारे इस अद्भुत-अनुपम व स्वर्गीय दृश्य को देख विभोर हो रहे थे। 
"भाई-बहिन, बस भी करोगे अब? या बाढ लाओगे आंसुओं की....."
यह हीरा दादा की पत्नी थीं। उनके स्वर की कटुता, बडी खटकने वाली थी। इन भाई-बहिन पर कोई प्रभाव नहीं पडा। वे दोनों इनके कर्कश स्वभाव से भली भांति परिचित थे।
 
इस घटना के समय मेरा वय आठ वर्ष था। दादी पचास पार कर ली होगी। बैंक ज्वाइन करने के पश्चात एक बार और इस देवोपम दृश्य को देख पाने का परम सौभाग्य मिला मुझको। 
इस बार मैं लगभग अट्ठाईस वर्ष का, दादी सत्तर के पार और हीरा दादा लगभग अठासी वर्ष के। दोनों के शरीरों की कांति अब भी वैसी ही थी। हालांकि दोनों ही दुर्बल हो चुके थे। दोनों की दंत-पंक्ति, सिरे से साफ हो चुकी थी जैसे गंजों के सिर से केश अंतर्धान हो जाते हैं!
हीरा दादा अपने पोपले मुख से;
"गोदा....गोदा....गोदा!"
कहते हुए अपने से चिपटाए खडे थे दादी को। दादी,अपने चेहरे पर पूर्ण आश्वस्ति के भाव लिये, आंखें मींचे आलिंगनबद्ध थीं। इन दोनों के संग, आज मेरी आंखें भी बरस रहीं थीं। 
"जब मिलते हो, रोने लगते हो....बस भी करो!"....
कर्कश घोषणा से चिंहुक पडा था मैं, किंतु इन भाई-बहिन पर किंचित भी असर न हुआ था! इन दोनों की गंगा-जमुना और अब मेरी सरस्वती की यह त्रिवेणी, निर्बाध बही जा रही थी। 
हीरा दादा, दिल के 'हीरा' थे!
सच्ची!!!!

- सत्येन भंडारी

रचनाकार परिचय
सत्येन भंडारी

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संस्मरण (2)