प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
नवम्बर 2017
अंक -52

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

उभरते-स्वर

माँ-बाप की जान होते है बच्चे

कभी मासूम कभी शैतान होते हैं बच्चे
हर एक माँ-बाप की जान होते हैं बच्चे

कभी ग़म तो कभी मुस्कान से भर देते
या फ़रिश्ते या भगवान होते हैं बच्चे

उम्मीद ना परवाह कुछ कर गुज़रने की
अपने ही सपनों की उड़ान होते हैं बच्चे

कभी मिट्टी में घर, काग़ज़ में कस्ती ढूंढते
सागर की लहरों से अनजान होते है बच्चे

बयां करते हैं खिलौनों से अपनी बातें
सच से परे इतने नादान होते हैं बच्चे


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बच्चे होते हैं भगवान

बच्चे होते हैं भगवान
शरारत इनकी है पहचान
ख़ुद से भी ज़्यादा रखते हैं
हम तो इनका ध्यान

कभी चन्दा को मामा बताते
कभी मछली पे गाना गाते
नानी की कहानी सुनाते
कभी चोरों का पता बताते
धन, दौलत से भी बढ़कर
लगती प्यारी इनकी मुस्कान

आसमान के तारे गिनते
माँ की लोरी भी ये सुनते
कुछ पाकर कुछ बनने की
उम्मीदों पर ख्वाब ये बुनते
ज़िद करते फिर डांट भी खाते
ये फिर भी रहते सबकी जान


- कमल कर्मा
 
रचनाकार परिचय
कमल कर्मा

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उभरते स्वर (2)