अक्तूबर 2017
अंक - 31 | कुल अंक - 55
प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
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संस्मरण

महागढ़ चित्तौड़: एक  स्मृति-यात्रा


चित्तौड़ का महादुर्ग। सिसौदिया राजवंश के गौरव का प्रतीक-  बप्पा रावल, गोरा बादल, महाराणा कुम्भा, राणा सांगा, जयमल फत्ता जैसे महावीरों के प्रखर शौर्य का साखी महाकोट। जायसी के महाकाव्य ‘पद्मावत’ की कर्मभूमि। महारानी पद्मिनी, रानी कर्मावती और अनगिनत राजपूतनियों के जौहर से पावन हुआ यह वीर स्थल। युवराज चण्ड की भीष्म प्रतिज्ञा और चूड़ावत सरदारों के बलिदानों से पोषित यही है वह पुण्यभूमि, जो सदियों सदियों दिल्ली के मुस्लिम शासकों की आँखों की किरकिरी बना रहा। आज भी उसी संघर्ष गाथा का हवाला देता खड़ा है यह खंडहर हुआ भारत का सबसे बड़ा किला। कृष्ण की अनन्य सखी मीरा की साधना स्थली भी तो यही है। राजकुँवर उदयसिंह की प्राणरक्षा हेतु अपनी औरस संतान के प्राणों की बलि देने वाली पन्ना धाय की अप्रतिम गाथा इसी किले के किसी कक्ष में लिखी गई थी। महाराणा प्रताप इसी दुर्ग का स्वप्न लिये तो मुगल सम्राट अकबर से निरन्तर संघर्षरत रहे। उनके वंशज आज तक उनके प्रण को निभाते चले आ रहे हैं यानी पर्ण शैया पर शयन और पत्तों पर भोजन।

मैं खड़ा हूँ इसी शौर्यस्थली में आज यानी 22 नवंबर 2008 की मीठी दोपहरी में। बचपन में राणाओं के महाकाव्यात्मक चरित्र पढ़े थे। महाराणा प्रताप के बहु प्रचारित चित्र की अनुकृति भी अंकित की थी। कल्पना में पता नहीं कितनी छवियाँ बसी हुईं थीं इस वीरभूमि की। ‘पद्मावत’ का कुछ अंश भी पढ़ा था बी.ए. में। भगवती मीरा के भजन तो धुर बालपन से सुने थे, गाये थे। प्राचीन भारत के अंतिम दौर यानी आठवीं से सोलहवीं शताब्दी के गौरवमय इतिहास के कई पृष्ठ यहीं तो लिखे गए थे। मैं उन सबको यहाँ एक बार फिर से पढ़ रहा हूँ। चित्रवत देख रहा हूँ बचपन की पढ़ी- सुनी तमाम घटनाओं को होते। निरख-परख रहा हूँ उन अनन्य अध्यायों को, जिनमें मानुषी अस्मिता को एक नया आयाम मिला था। मैं पलट रहा था बचपन में पढ़े इतिहास के पन्नों को भी, जिनमें बहुत कुछ झूठ-सच गढ़ा-लिखा गया था। यहाँ भ्रमण करते हुए इस ढली उम्र में मैं उनका पुनर्वाचन कर रहा था। कल्पना के अतीत को मैं सहेज भी रहा था और उसे खंडित होते भी देख रहा था। समय किस प्रकार हमारी दृष्टि को बदल देता है। कल्पना के अतिरंग किस प्रकार अपरूप हो जाते हैं यथार्थ से टकराकर। हाँ, यह भी। अंतिम यात्रा के निकट पहुँचा मन उस मरणोत्सव को भी देख रहा था, जो इस दुर्ग के चप्पे-चप्पे पर साकार बिखरा हुआ था। मृत्यु की वे गरिमामय आकृतियाँ मुझे एक ओर गौरवान्वित कर रहीं थीं तो दूसरी ओर मुझे अपने प्रति, आज के अपने क्षुद्र कालखंड के प्रति एक गहरे लज्जा बोध से भी भर रहीं थीं।

ऐतिहासिक मौर्यवंश के अवशेष राजाओं द्वारा निर्मित यह पहाड़ी दुर्ग आठवीं सदी के मध्य में बप्पा रावल के अधिकार में सोलंकी राजकन्या से विवाहोपरांत आया था। उसके बाद बप्पा रावल और उसके वंशजों ने किस प्रकार इसे एक साम्राज्य का केन्द्रीय दुर्ग बना दिया,  इसका भी सदियों में विस्तृत एक गरिमामय इतिहास है। आठ शताब्दियों के इस इतिहास में इस दुर्ग ने कई आक्रमण झेले। ईस्वी सन् 1303 में दिल्ली के खिलजी सुलतान अलाउद्दीन ने महारानी पद्मिनी को पाने के लिए जो छल- कपटभरा उद्यम किया, उसकी साक्षी किले का बीहड़ पथवाला अब उपेक्षित-पड़ा सूरजपोल एवं रानी पद्मिनी का महल आज भी दे रहे हैं। मैं खंड- खंड बिखरे सूरजपोल को देखकर अपनी बुढ़ाई देह पर भी हुए काल के प्रहार की गाथा पढ़ रहा हूँ। उसी काल की गति को पद्मिनी के महल में भी मैं देख पा रहा हूँ। समय ने सब कुछ बदल दिया है। अनन्य सुन्दरी पद्मिनी तो सदियों पूर्व जौहर की चिताग्नि में विलीन हो गई थी। आज उसका सूना शंखवर्णी महल चुपचाप खड़ा हम सैलानियों की पगचापों को सुन रहा है और हमें लगभग सात सौ वर्षं पूर्व के इतिहास की ओर ले जा रहा है। उसे चारों ओर से घेरे पुराकाल का पद्मताल आज सूखा पड़ा है। कमलिनी ने अग्निस्नान किया तो ताल क्या करता। उसके कमल पुष्प झुलस ---मुरझा गये और ताल तपकर जलविहीन हो गया। यही तो प्रतीक- कथा है मानव के युगों --युगों के संघर्ष की। अप्रतिम सौन्दर्य भी तो अकालजीवी नहीं। इसी महल के किसी तलघर- कक्ष में ही तो राजरानी पद्मिनी ने अलाउद्दीन के हाथों से अपने शीलरक्षण हेतु अन्य राजपूत बालाओं के साथ आत्मदाह किया होगा। चित्तौड़ की राजपूत बालाओं का यह प्रथम जौहर-प्रकरण  मेरी कल्पना को धुर बचपन से उद्वेलित करता रहा था। आज उस आत्म- बलिदान के पुण्यस्थल पर खड़े होकर मैं भाव विभोर हो रहा  हूँ । सन् १३०३ के अंत में हुआ वह जौहर- साका प्रसंग आज भी हमारे अवचेतन में कहीं समोया हुआ है। बाद में,  सन्  १५३५ में गुजरात के बहादुरशाह के हाथों पराजित होने के समय महाराणा सांगा की विधवा रानी कर्मवती ने और मुग़ल सम्राट अकबर द्वारा १५६८ में पद दलित होने के उपरांत किले की उस समय की राजपूतनियों ने  भी इसी परंपरा का निर्वाह किया था। किले के जौहरताल के तट पर खडे. होकर मैं उन्हीं प्रसंगों को अपने अवचेतन में दोबारा उकेर रहा हूँ। समय के अंतराल ने सब कुछ बदल दिया है,पर भावजगत में तो वे सारे प्रसंग पूर्ववत् उपस्थित हैं।

चित्तौड़ का सिसौदिया राजवंश भगवान एकलिंग अर्थात संहार के देवता महादेव शिव का उपासक था, जिसका प्रमाण है दुर्ग के प्रांगण में अवस्थित प्राचीन समिद्धेश्वर महादेव का मंदिर, जो संभवतः बाप्पा रावल के समय का है और बाद में महाराणा मोकल ने उसका जीर्णोद्धार कराया था। उसमें स्थापित त्रिमुखी महादेव की भव्य प्रतिमा के साथ  साथ वहाँ उकेरी शिल्पाकृतियाँ सिसौदिया राणाओं के सौन्दर्य बोध एवं भक्तिभाव की साक्षी हैं। उसी भक्ति का महती स्वरूप अंततः मीरा की अनन्य कृष्णभक्ति के रूप में प्रस्फुटित हुआ। महाराणा कुंभा द्वारा निर्मित कुंभश्याम मंदिर और उसी प्रांगण में स्थित मीराबाई का प्रसिद्ध मंदिर राणाओं की कृष्ण भक्ति का प्रमाण आज भी दे रहे हैं। उन मंदिरों की शिल्प- समृद्धि चकित- विस्मित करती है। मीरा  मंदिर में पहले के सुने- पढ़े मीराबाई के भजन मेरे मन प्राण में देर तक गूँजते रहे। भाव जगत की वह साधना भूमि मेरी कविताई को भी टेरती प्रेरती रही। मोहाविष्ट मैं निहारता रहा वंशी -बजैया गोपालकृष्ण की उस भव्य मूर्ति  को, जिसकी उपासना में लीन भगवती मीरा ने उन अमर पदों का रचना गायन किया होगा, जिन्हें बाँच- सुन कर मुझमें कविता के बीज अंकुरित हुए होंगे।मंदिर से बाहर निकलकर कुछ क्षणों के लिए मैं बाहर के यथार्थ से अपने को जोड़ नहीं पाया। मंदिर के अंदर गहरे मौन की जो भावस्थिति रही थी, उसकी लय जब खंडित हुई, तब कहीं मैं यथार्थ को पहचान पाया। काश, वह सम्मोहन मेरे मन- प्राण में सदा बना रहता।

राणा कुंभा द्वारा ईस्वी सन् 1440 में गुजरात विजय के स्मृतिचिहृ के रूप में निर्गित सैंतीस मीटर ऊँचा और नौ मंजिला विजयस्तम्भ आज भी अक्षुण्ण उस कालखंड की गौरव गाथा कह रहा है। चित्तौड़ का सूर्य तब चारों ओर प्रखर तप रहा था। उसी का प्रतीक है यह प्रस्तर महास्तम्भ। उससे दूर जाते हुए मैं देर तक उसे निहारता एवं अपनी स्मृतियों में सँजोता रहा। किले के दूसरे सिरे पर है जैन मतावलंबियों के आदि तीर्थंकर ऋषभदेव को समर्पित बाइस मीटर  ऊँचाई वाला कीर्ति स्तम्भ, जिसमें उनकी भव्य प्रतिमा स्थापित है।गाथा कह रहे हैं ये दोनों स्तम्भ दुर्ग के शौर्य और उसकी धार्मिक संचेतना की गरिमा की। गौमुख जल भंडार एवं भीमताल किले की पुराकाल की जल व्यवस्था के कौशल के साक्षी हैं। मान्यता है कि भीमताल पाण्डव भीम के पैर के अँगूठे के प्रहार से निर्मित हुआ था। हम भारतीयों की मिथकीय कल्पना रामायण -महाभारत के पात्रों- प्रसंगों से घनिष्ठ रूप से जुड़ी हुई है। कालिका माता मंदिर की आज बड़ी महिमा है। वस्तुतः बाप्पा रावल ने एक शिवमंदिर के रूप में इसका निर्माण कराया था। बाद में इसे कालीमंदिर का रूप दिया गया। मैं इन सभी स्थानों पर घूमते हुए उस परंपरा के बारे में सोचता रहा, जिससे पूरा भारत कभी एकसूत्र रहा था।  

शाम हो चली है। हम लौट चले हैं राणा कुंभा के महल की ओर साढ़े  छः बजे शुरू होने वाले ‘लाइट ऐंड साउंड’ कार्यक्रम के लिए। यही वह महल है जिसने राणा कुंभा एवं राणा सांगा के प्रताप को देखा है, मीरा की कृष्णभक्ति के विरोध को झेला है, मेवाड़ के उस अंधकाल के षडयंत्रों का भी गवाह रहा है जिनकी अंतिम परिणति पन्ना धाय के बलिदान और शिशु राजकुँवर उदयसिंह के चित्तौड़ से पलायन में हुई। वही प्रस्थान बिंदु था चित्तौड़ की गरिमा के अवसान का भी। सन् १५६८ में अकबर के आक्रमण से ध्वस्त हुआ यह महल भी। किले में जगह जगह उस आक्रमण के ध्वंसावशेष बिखरे पड़े हैं। उन्हीं में से एक यह महल भी। डूबते सूर्य की रक्त -नहाई जोत वही ध्वंस गाथा तो लिख रही है महल के इन खंडहरों में। प्रकाश एवं  ध्वनि कार्यक्रम के पहले ही मैं उस चित्तौड़  पतन काल की घटनाओं को अपने मन में घटित होते देख रहा हूँ। कार्यक्रम के दौरान भी अँधियारे में बैठा मैं प्रसारण से अलग अपने मन के चित्र-बिम्बों को ही अवलोक रहा हूँ। कल्पना न जाने कहाँ -कहाँ विचर रही है। खंडहर के सारे कक्ष -सारे गलियारे जीवित हो उठे हैं। मेरी जातीय स्मृति उनमें विचर रही है और मैं कभी राणा कुंभा, कभी राणा सांगा बनकर उनमें विचर रहा हूँ, कभी उदयसिंह बनकर उन गलियारों -कक्षों के नीचे छिपे गुप्त मार्गों से पलायन कर रहा हूँ । शस्त्रों- कवचों- शिरस्त्राणों की झंकार आ रही है, ‘हर हर महादेव’, ‘अल्लाहो अकबर’के नारे और ललकारें भी। मैं उन्हें सुन रहा हूं एक अनजानी अतीत स्मृति में डूबा हुआ। बाहर की इस यात्रा के साथ एक अंतर्यात्रा भी हुई है। वही तो है इस यात्रा का मुख्य आख्यान।

हम लौट चले हैं   हम यानी सरला और मैं, मेरे बहन- बहनोई - रमा और सतीश। चित्तौड़ का महागढ़ आंखों से दूर होता जा रहा है, किंतु जो चित्तौड़ भीतर आन बसा है, वह तो जीवन पर्यन्त मेरे मन में साकार रहेगा। वही तो है वह निधि जो मेरी कविता, मेरे लेखन को समृद्ध करेगी, उसे एक नया आयाम देगी।


(साभार:- 2013 में नेशनल बुक ट्रस्ट से प्रकाशित  यात्रावृत्त संकलन 'और यह यायावरी मन की' से)


- कुमार रवीन्द्र

रचनाकार परिचय
कुमार रवीन्द्र

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