अक्तूबर 2017
अंक - 31 | कुल अंक - 53
प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

आलेख

नासिरा शर्मा की कहानियों में मेहनतकश वर्ग की अभिव्यक्ति- आकांक्षा भट्ट


हिन्दी में गद्य लेखन की शुरूआत ने अनेक विधाओं को जन्म दिया, जिसमें कहानी आज एक अत्यन्त लोकप्रिय विधा के रूप में स्वीकृत हो चुकी है। वैसे तो इसका जन्म मौखिक रूप में मानव सभ्यता के अस्तित्व से माना जाता है क्योंकि कहानी कहना तथा सुनना मानव का आदिम स्वभाव रहा है। यही कारण है कि दुनिया के प्रत्येक समाज में अपने ढंग की कई कहानियाँ आज भी मौजूद हैं। भारत जैसे प्राचीन, प्रभुत्वसम्पन्न, पंथनिरपेक्ष, बहुऐश्वरवाद व धार्मिक देश में कहानियों की बड़ी लम्बी और संपन्न परम्परा रही है। जिज्ञासा और आत्माभिव्यंजना की नैसर्गिक प्रवृत्तियाँ ही कहानी कला की मूल सृजन शक्तियाँ हैं।
प्रेमचन्द्र कहानी के संदर्भ में कहते हैं कि "कहानी ऐसी रचना है, जिसमें जीवन के किसी एक अंग या किसी एक मनोभाव को प्रदर्शित करना ही लेखक का उद्देश्य रहता है। उसके चरित्र उसकी शैली उसका कथा-विन्यास सभी उसी एक भाव को पृष्ठ करते हैं।" आधुनिक काल में कहानियाँ समाज के परिवेश व मनुष्य की विचारधारा के अनुरूप अपने चरित्र, शैली, कथ्य, शिल्प के आधार पर निरन्तर विकास करती गयी। आज चूँकि समकालीन साहित्य में अस्मितामूलक विमर्शों ने हिन्दी की लगभग हर विधा में अपना लेखन कार्य बड़ी ही दृढ़ता एवं स्पष्ट शब्दों में अभिव्यक्त कर अपनी प्रामाणिकता सिद्ध की है। दलित, स्त्री, आदिवासी एवं अल्पसंख्यक आदि विमर्शों ने अपनी कहानियों, उपन्यासों एवं आत्मकथाओं आदि के द्वारा वर्ग चेतना, संघर्ष, प्रतिबद्धता एवं विश्वदृष्टि के साथ-साथ शोषण, अमानवीयता, गुलामी, ब्राह्मणवादी मानसिकता, पुरूषवादी मानसिकता, पूंजीवादी मानसिकता, सांप्रदायिकता, क्षेत्रवाद आदि का दृढ़ता से विरोध किया है। इस अस्मितामूलक रचनाशीलता ने न केवल जातीय अस्मिता को अपने लेखन में उभारा बल्कि समाज से हाशिए पर डाल दी गई अस्मिताओं को पुनः समाज की मुख्यधारा में लाने का सफल व सार्थक प्रयास किया। दुनिया में कहे जाने वाले मेहनतकश या श्रमिक वर्ग की श्रेणी में इन सभी अस्मिताओं दलित, आदिवासी, स्त्री व अल्पसंख्यक आदि को बड़ी ही गहराई से पहचाना जा सकता है। हिन्दी साहित्य में दलित, आदिवासी, स्त्री व अल्पसंख्यक कथाकारों की संख्या पहले की अपेक्षा आज बेहतर है। इन सभी कथाकारों ने अपने वर्ग चेतना की अभिव्यक्ति के आधार पर अपने-अपने वर्ग का प्रतिनिधित्व किया है।


नासिरा शर्मा हिन्दी साहित्य की उन लेखिकाओं में से हैं, जो केवल स्त्री विमर्श पर ही नहीं बोलती हैं बल्कि समाज के हर वर्ग, वर्ण, लिंग, धर्म, जाति, समुदाय, एवं सम्प्रदाय पर भी बेहिचक बोलती हैं। उनकी अब तक लगभग 125 से ज्याादा कहानियाँ प्रकाशित हो चुकी हैं। कहानियों के अलावा उनके 7 उपन्यास भी प्रकाशित हो चुके हैं। इतने विराट कथा साहित्य पथ पर यात्रा करते हुए नासिरा शर्मा का संपूर्ण कथा संसार आज समूचे हिन्दी साहित्य में अपना अलग व नये वैशिष्ट को लेकर नई वैचारिकी को जन्म दे रहीं हैं। आज वो हर अस्मिताएं वह चाहे स्त्रियों पर हो रहे अमानवीय शोषण हो, चाहे मेहनतकश मजदूर दलित, स्त्री, आदिवासी एवं अल्पसंख्यक वर्गों पर हो रहे अमानवीय व्यवहार हो। इन सभी पर उनकी बेबाक अभिव्यक्ति ने सभी का ध्यान आकृष्ट कराया है। उनकी संपूर्ण कहानियों का क्षेत्र अत्यन्त व्यापक है। प्रस्तुत शोध प्रपत्र की दृष्टि से यह दिखाने का प्रयास किया गया है कि नासिरा शर्मा की सभी कहानियाँ वैश्विक फलक पर मेहनतकश वर्ग की गम्भीर समस्याओं को रेखांकित करती हैं। उनकी कहानियों में लगभग सभी पात्र, वह चाहे स्त्री हो चाहे पुरूष समाज के द्वारा बनाये गये परम्परागत नियमों, व्यवस्थाओं में रहकर कैसे उपेक्षित, दमित, शोषित एवं मानवीय अधिकारों से वंचित रह जाता है। उनका हर पात्र मेहनतकश है, श्रमिक है। अपने शोध प्रपत्र की प्रस्तुति का मूल उद्देश्य नासिरा शर्मा की कहानियों के द्वारा दुनिया भर के मजदूर-किसान, स्त्री-पुरूष संबंध और दलित-आदिवासी-अल्पसंख्यक आदि की समस्याओं को समझते हुए उसमें मेहनतकश वर्ग के जीवन व संघर्ष को व्यापक स्तर पर उद्घाटित करना है।


कार्ल मार्क्स की अवधारणा है कि- "अब तक का सारा इतिहास वर्ग संघर्ष का इतिहास है।" वर्ग संघर्ष चूँकि दो परस्पर विरोधी शक्तियों के कारण उत्पन्न होता है। ये दो विरोधी शक्तियाँ मूलतः शोषक व शोषित हैं। अब यदि हम संपूर्ण इतिहास पर नजर डालें तो पाते हैं कि सभ्यता के विकास में आदिम साम्य व्यवस्था से लेकर नव्य पूंजीवाद के दौर तक समाज कई युगों में विभक्त हुआ है। ऐसे में युग विभाजन के साथ-साथ वर्ग विभाजन भी हुआ। दरअस्ल किसी भी युग में जीविका उपार्जन की प्राप्ति के विभिन्न साधनों के कारण ही समाज में अलग-अलग वर्गों का विभाजन हुआ। आदिम साम्य व्यवस्था में कोई वर्ग नहीं था। सभी अपने जरूरत की वस्तुओं को अपनी आवश्यकता की पूर्ति के लिए प्रयोग करते थे। अर्थात प्रकृति द्वारा जीवित रहने के साधनों का वितरण समान होने के कारण वर्ग का जन्म उस समय नहीं हुआ था, लेकिन बाद में यही मनुष्य शक्ति संचय करता हुआ एक-दूसरे से शक्तिशाली हो गया। शक्ति संचय में विभेद आने से समाज वर्गो में विभाजित होने लगा। मार्क्स के अनुसार समाज स्वयं अपने को वर्गों में विभाजित कर लेता है। यह विभाजन अमीर और गरीब, शोषक और शोषित तथा शासक और शासित वर्गों में होता है।

आधुनिक समाज में आय के साधन एवं शक्ति संचयन के आधार पर तीन महान वर्गों का उदय हुआ। पहला, जो केवल श्रम शक्ति का अधिकारी है दूसरा, जो पूंजी का अधिकारी है और तीसरा, जो जमींदार हैं। इन तीनों के आय के साधन मजदूरी, लाभ व लगान हैं। मजदूरी के लिए मजदूर, पूंजीपति के लिए लाभ व जमीदार के लिए किसान। इन तीनों वर्गों के उदय का प्रमुख कारण बड़े पैमाने पर पूंजीवादी उद्योग धन्धों के पनपने के फलस्वरूप हुआ। कुल मिलाकर जीविका उपार्जन के अधिक साधन के कारण ही वर्गों का जन्म हुआ और इन वर्गों के उत्पादन कार्य में लगे हुए व्यक्ति समूहों; मजदूर किसान आदि की एक मात्र पूंजी श्रम होती है और अपने श्रम को बेचकर ही वे अपने पेट पालते हैं इसी वर्ग को मेहनतकश वर्ग या श्रमिक वर्ग कहा जाता है।

विश्व के प्रत्येक साहित्य में अपने समय, समाज व व्यक्ति के आधार पर इस मेहनतकश वर्ग की अभिव्यक्ति को अधिकांशतः देखा जा सकता है। ब्रिटेन, रूस, युनान, फ्रांस, अमेरिका आदि के देशों में अनेक साहित्यिक रचनाएं लिखी गयीं, जो पूंजीपतियों, जमीदारों, राजे-रजवाड़े के द्वारा किसान, मजदूरों, गरीब असहाय जनता पर किया गया शोषण व संघर्ष की गाथा को दर्शाते हैं। देश की लगभग सभी क्रांतियाँ मेहनतकश वर्ग के द्वारा ही लड़ी गयी हैं। आधुनिक भारत में बंगाल, महाराष्ट्र, दक्षिण एवं हिन्दी के अनेक प्रदेशों में लिखा गया अधिकांश साहित्य शोषित वर्ग गरीब, मजदूर, किसान, दलित एवं स्त्री आदि पर ज्यादा केन्द्रीत रहा है। ब्रिटिश प्रशासन की गुलामी, सामंतों के अत्याचार, महाजनी कुव्यवस्था, जातिवाद, स्त्रियों की दयनीय स्थिति व हिन्दू-मुस्लिम विभेद आदि शोषण का स्वरूप हमारे साहित्य में दिखाई देता है। सर्वप्रथम प्रेमचन्द्र जी ने भाषण में यह आह्वान किया कि हमें अब गरीब, कमजोर, दलित, स्त्री, असहाय मेहनतकश जनता के लिए साहित्य लिखना होगा। हिन्दी में प्रगतिवादी युग के अधिकाश साहित्य मेहनतकश वर्ग के लिए लिखे गये हैं। प्रेमचन्द्र, यशपाल, निराला, नागार्जुन, केदारनाथ अग्रवाल, मुक्तिबोध, धूमिल, आदि ने अपने साहित्य में इस वर्ग का स्पष्ट शब्दों में उल्लेख किया है। बाद में अस्मितामूलक विमर्शों ने अपने लेखन में दलित, आदिवासी, स्त्री और अल्पसंख्यक आदि की सशक्त अभिव्यक्ति की। इन सभी की समस्याओं के आधार पर हर कहानीकारों ने अपने ढंग से कहानियाँ लिखीं।

समकालीन महिला कहानीकारों ने नारी जीवन के संघर्ष, स्त्री-पुरूष संबंधों, यौनिकता, पारिवारिक विघटन, सामाजिक असमानता, गरीबी, शोषण आदि पर अनेक कहानियाँ लिखीं। मन्नू भंडारी, प्रभा खेतान, उषा प्रियंवदा, नासिरा शर्मा, मैत्रयी पुष्पा, चित्रा मुगद्ल, शिवानी, ममता कालिया, इश्मत चगुताई आदि कई ऐसी लेखिकाएं हैं जिन्होंने अपने सृजनात्मक कौशल एवं गहन वैचारिकता के आधार पर स्त्री जीवन से जुड़ी समस्याओं के साथ-साथ वैश्विक स्तर पर मानवतावादी सोच के साथ अनेक कहानियाँ लिखीं।

समकालीन कहानीकारों में सशक्त हस्ताक्षर नासिरा शर्मा की कहानियों का आधार महानगरीय जीवन, अचंल, खेत-खलिहान, नौकरीपेशा महिलाओं-पुरूषों और मेहनतकश किसान मजदूरों तक ही सीमित नहीं रहा है बल्कि उनके समग्र लेखन का दायरा भारत की विभिन्न धर्म संस्कृतियों वाले सामाजिक-आर्थिक परिवेश से आगे जाकर ईराक, इरान, अफगानिस्तान जैसे मुस्लिम देशों के सामाजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक परिवेशों को समझने में भी कामयाब हुआ है। नासिरा शर्मा का जन्म अगस्त 1948 ई. में इलाहाबाद में हुआ था। साहित्यिक रूझान इन्हें विरासत में मिला। हिन्दी, उर्दू, फारसी, पश्तो, और अंग्रजी भाषाओं पर इनका अच्छा अधिकार है। इन पर प्रेमचन्द्र, कायदा जबस्सुम, कुर्तुल-एन-हैदर, मंटो, कृश्नचंदर, इस्सर, कृष्णबलदेव वैद और अब्दुल्ला आदि का विशेष प्रभाव पड़ा। नासिरा जी की पहली कहानी ‘राजा भइया‘ सातवीं कक्षा में पढ़ने के दौरान प्रकाशित हुई थी। वे कहती हैं- ‘‘सन् 1975 में जब हमने संजीदगी से सोचा कि कुछ लिखा जाए तो कहानी लिखना शुरू किया सन् 1975 में ‘सारिका‘ के नवलेखन अंक में मेरी कहानी ‘बुतखाना‘ और ‘मनोरमा‘ पत्रिका में ‘तकाजा‘ प्रकाशित हुई‘‘1 नासिरा शर्मा ने हिन्दी कहानियों में मौलिकता एवं गुणात्मकता की दृष्टि से असाधारण योगदान दिया है। उनकी कहानियों में ग्रामीण व शहरी दोनों परिवेश जीवन के आत्मसंघर्ष, समस्याओं, मनोदशाओं को बड़ी ही पारदर्शिता, बौद्धिकता और सार्थकता से परिलक्षित किया गया है। ‘बुतखाना‘ कहानी संग्रह में कुल 21 कहानियाँ हैं। जिसमें नमकदान, गुमशुदा लड़की, अपनी कोख, घुटन, ठंड़ा बस्ता, पानी, मरियम, शर्त, कल की तमन्ना एवं कैदघर आदि प्रमुख हैं। वह अपने कहानी के संदर्भ में कहती हैं कि ‘‘ ‘दूसरा ताजमहल‘ भी मेरी इन कहानियों की तरह पसन्द की गयी है। इसकी  पीड़ा उतनी ही गहरी है जितनी काम की निष्ठा को न पहचान सकने पर मैंने ‘सिक्का‘ लिखी थी। उसी तरह जबानी अदा किए गए शब्दों का प्रयोग इतनी लापरवाही से लोग करने लगे हैं कि शब्दों का अर्थ, गरिमा, उनका वाइब्रेशन ही खत्म कर दिया गया है। कहने को यह भी ‘सिक्का‘ की तरह प्रेम कहानी है मगर वास्तव में आज का यह बेहद तकलीफदेह सच है जो इंसान को जानवर से अलग करने वाली पहचान को अपनी ही आवाज से धूमिल कर रहा है।‘‘2 नासिरा शर्मा का कहानी संग्रह ‘शामी कागज‘ व ‘संगसार‘ ईरान, अफगानिस्तान के बीच गृहयुद्धों से उपजी अमानवीयता की पृष्ठभूमि पर आधारित है। किस्सा जाम 37 कहानियों का संग्रह है जो इराक की लोक संस्कृति पर आधारित है। ‘परी राजकुमारी', ‘चतुर दरवेश‘, ‘तीन बहनें‘, ‘बुद्धिमान लड़का‘, 'पारिजात' और 'नारंगी की लड़की' आदि प्रमुख हैं। ‘इब्ने मरियम‘ कहानी संग्रह जिसमें 13 कहानियाँ हैं। भोपाल गैस त्रासदी पर आधारित यह संग्रह  मानवीय संवेदना का गहरा एहसास कराता है। लेखिका स्वयं उस स्थिति की सच्चाई से मुखातिब होती है जो झूठ का साही चोगा पहने हुए है और उसके अन्दर के हर धागे इन्सान के खून से रंगे हुए हैं। सबीना के चालीस चोर कहानी संग्रह में कामकाजी स्त्री के जीवन चरित्र, राजनीतिक परिवेश, प्रशासनिक व्यवस्था आदि का बेहद सूक्ष्म विश्लेषण किया गया है। ‘खुदा की वापसी‘ कहानी संग्रह के माध्यम से लेखिका ने यह बताने की कोशिश की है कि अपनी जड़ों को पहचानने की कोशिश की जानी चाहिए, समाज, मेहनतकश वर्ग, और स्त्री आदि के घुटन की बुनियादी समस्याओं को पहले समझना चाहिए तभी उपेक्षा, प्रताड़ना, शोषण के खिलाफ आवाज उठाई जा सकती है। इस संग्रह में कुल 9 कहानियाँ हैं। नासिरा शर्मा द्वारा लिखित कहानी ‘खुदा की वापसी’ एक ऐसी कहानी है जो पूरी तरह से एक स्त्री के द्वारा दुनियावी खुदा अर्थात पति को जानने के प्रति तत्परता को लेकर लिखी गई है।

नासिरा शर्मा के जीवन अनुभव तथा परिवेश भिन्न होने के कारण उनकी कहानियों का मिजाज भी भिन्न प्रतीत होता है। अधिकांशतः देखा गया है कि जब भी कोई महिला लेखन करती है तो उसके लेखन का मूल्याकंन मात्र स्त्री-विमर्श के दायरे में रख कर ही किया जाता है। समाज में जैसी स्थिति स्त्री की है, ठीक वही स्थिति साहित्य लेखन के क्षेत्र में भी है। यही कारण है कि हिन्दी की अधिकांश लेखिकाओं के लेखन के साथ सही न्याय नहीं हो पाता। नासिरा शर्मा की अधिकांश कहानियाँ मध्यवर्ग के मेहनतकश महिलाओं एवं पुरूषों पर आधारित हैं। नासिरा शर्मा हिन्दी साहित्य की उन लेखिकाओं में से हैं जो केवल स्त्री विमर्श पर ही नहीं बोलती हैं बल्कि वह समाज के हर वर्ग, वर्ण, लिंग, धर्म, जाति, समुदाय, एवं संम्प्रदाय पर भी बेहिचक बोलती हैं। हमें किसी भी लेखक के रचनात्मकता के विविध आयामों को देखते हुए उसका मूल्याकन किसी एक फ्रेमवर्क में रखकर करना गलत है। इनकी कहानियों में करीब एक सौ से अधिक कहानियाँ समाज के विभिन्न तबकों मध्यम वर्ग अभिजात्य वर्ग और न्यूनमध्य वर्ग की हैं। पत्थर गली, संगसार, शामी कागज, इब्ने मरियम, तुम डाल डाल हम पात पात, और गोमती देखती रही, प्रोफेशनल वाइफ, पंच नगीने वाले, गली घुम गई एवं सन्दूकची आदि कहानियाँ उस मेहनतकश वर्ग का चरित्र खींचती हैं जो समाज में सदियों से शोषित व उपेक्षित रहा है।


- आकांक्षा भट्ट

रचनाकार परिचय
आकांक्षा भट्ट

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