अक्तूबर 2017
अंक - 31 | कुल अंक - 55
प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

आलेख

प्रवास और दारिद्रय- डॉ. मधु संधु
(प्रवासी महिला कहानीकारों के संदर्भ में)


प्रवास दो प्रकार का होता है। अंतर्देशीय और अंतर्राष्ट्रीय। प्रवास अल्पकाल, या पर्यटन से सम्बद्ध नहीं, इसका संबंध जन्म स्थान से उखड़ कर बनाए गए स्थायी निवास से है विश्व बैंक की 2011 की विश्व पलायन रिपोर्ट के अनुसार विश्व की 3% जनसंख्या यानी 21.5 करोड से अधिक लोग प्रवासी हैं, अर्थात अपने जन्म देश से दूर रहते हैं। प्रवास के मूल में दो कारण माने गए है- 1. पुश फैक्टर और पुल फैक्टर। पुश फैक्टर में बेरोज़गारी, प्राकृतिक असंतुलन, राजनैतिक संत्रास/आतंक आदि आते हैं। जबकि पुल फैक्टर में व्यक्ति बेहतर रोज़गार, बेहतर शिक्षा, बेहतर सुरक्षा के कारण पलायन करता है। एक अनुमान के अनुसार भारत के लगभग तीन करोड़ लोग 110 देशों में प्रवासी रूप में रह रहे हैं। 1838-1917 में करारबद्ध मजदूर के रूप में भारतीय कैरेबियन देशों (मारिशस, फीजी, गोयाना आदि) में गए थे। 19वीं शताब्दी में कैनेडा पलायन शुरू हुआ, जबकि 1919 तक वे पत्नी-बच्चे नहीं ले जा सकते थे। अमेरिका में प्रथम हिन्दू परिवार 1889 में आया था। ब्रिटेन में भारतीयों को रहते सौ साल से भी अधिक हो गए हैं। अब उनकी तीसरी पीढ़ी चल रही है। सत्तर के दशक में पैट्रोलियम बूम के कारण भारतीय खाड़ी देशों में आए। आज पूरे विश्व में प्रशिक्षित भारतीय भी फैले हुये हैं। कोई ऐसा क्षेत्र नहीं, जहाँ उनका अधिकार न हो।

सभी देशों में भारतीय वहाँ की आर्थिक और राजनीतिक, व्यावसायिक और वैज्ञानिक, शैक्षिक और मीडिया आदि की दशा और दिशा के स्वरूप निर्धारण में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। इंदिरा नूई, रेणु खटोर, कल्पना चावला, सुनीता विलियम्स, शेफाली राज़दान दुग्गल, बॉबी जिंदल (अमेरिका),  डोनाल्ड रामावतार (गुयाना के राष्ट्रपति) उज्जल देव सिंह दोसांज (कैनेडा), लॉर्ड स्वराज पॉल, प्रीति पटेल (मंत्री, ब्रिटेन) आदि प्रमुख नाम हैं। लेकिन ऐसा नहीं है कि प्रवास की धरती पर पहुंचा हर भारतीय आर्थिक स्तर पर सम्पन्न ही हो। प्रवासी महिला कहानीकारों ने प्रवासियों की गरीबी को स्वर भी दिया है। यह बात और है कि यहाँ और वहाँ की गरीबी में अंतर है।

विदेश जाने के लिए, वहाँ रहने के लिए, वहाँ से लौटने के लिए सबसे पहले पैसे का जुगाड़ करना पड़ता है। आज से लगभग पचपन वर्ष पहले उषा प्रियम्वदा ने अपनी ‘मछलियाँ’ कहानी में पाठक को इस सच्चाई से रू-ब-रू करवाया था। ‘मछलियाँ’  में विजयलक्ष्मी यानी विजी सौतेली माँ और घर के लोगों से झगड़ा करके, नानी के दिये सारे गहने बेचकर अपने मंगेतर मनीष के लगातार आ रहे पत्रों के कारण उसके लिए भारत से अमेरिका आती है और हवाई अड्डे पर पहुँच पता चलता है कि वह तो मैक्सिको गया हुआ है। जब पता चलता है कि जिस मनीष के लिए वह सब कुछ दांव पर लगाकर अमेरिका आई है, वह मुकी को चाहता है तो पराए देश में उसकी स्थिति और भी दयनीय हो जाती है। अब क्या करे, न किराये का जुगाड़ कर वह भारत आ सकती है और न वहाँ कोई अपना है, जो उसके भरण पोषण में सहायक हो सके। वह लाइबरेरी में काम करके किसी तरह अपनी जीविका जुटाने लगती है। गरीबी इतनी है कि रोज़ एक ही नीले फूलों वाली साड़ी पहननी पड़ती है। भारत लौटने के लिए टिकेट कहाँ से आए। इसके लिए उसे नटराजन से 1500 डॉलर मांगने पड़ते हैं।

उनकी ‘शून्य’ में यहाँ और वहाँ की गरीबी और जीवन संघर्ष है। पिता भारत में स्कूल के वाइस प्रिन्सिपल होकर भी दो-एक धोतीकुर्त्ते में गुज़ारा करते हैं और माँ किनारीदार धोतियों में खोपे भरती रहती है। जबकि विदेश में रह रहे बेटे राहुल की गरीबी यह है कि बहन की शादी पर बैंक से लोन लेकर बहन और जीजू के लिए अमेरिका की टिकटें जुटाता है। वह वहाँ एक वृद्धा के घर में रहने के बदले में गर्मियों में घास काटता है, सर्दियों में बर्फ साफ करता है। जीजू अविनाश की पीएच-डी. अभी पूरी भी नहीं हुई थी कि बीच में ही असिस्टेंटशिप बंद हो जाती है। लता किसी तरह आठ-आठ बच्चों की बेबी-सिटिंग करके घर चलाती है।
सुषम बेदी की ‘चट्टान के ऊपर, चट्टान के नीचे’  में न्यूयार्क के इस हिस्से में चट्टान के ऊपर गोरे अमेरिकनों की श्रेष्ठ बस्ती और यूनिवर्सिटी है और चट्टान के नीचे अभाव और गरीबी में पलती कालों की बस्ती। डोरा जॉनसन विश्वविद्यालय में एंथ्रोपोलोजी पढ़ाती हैं और पिछले पाँच वर्ष से चट्टान के ऊपर के अभिजात इलाके में रहती हैं। कालों की खुराफातों का कारण गरीबी है। नशीली दवाइयों का क्रय-विक्रय भी चलता रहता है। अवधारणा है कि सब काले लड़के चोर डाकू ही होते हैं। ऊपर के इलाके की सुरक्षा के लिए वे चेतावनी हैं। प्रोफेसर पोलिक को कुछ दिन पहले लूटा गया था। डोरा नीचे की बस्ती में रहने वाले जैस्सी को शुक्रवार के शुक्रवार सफाई के लिए कहती हैं, लेकिन मैनेजमेंट सुरक्षा का हवाला देती उसके आने पर रोक का फरमान जारी कर देती हैं।


सुधा ओम ढींगरा की ‘सूरज क्यों निकलता है’  कहानी अमेरिका में चल रहे मंदी के दौर और वेल्फेयर स्टेट का फायदा उठा रहे उन गरीब और निट्ठले लोगों से सम्बद्ध है, जो खाने के कूपन- शराब, सिगरेट, लड़की जैसी दूसरी ज़रूरतों के लिए बेचने के लिए संभाल कर, दान का खाना खाते हैं और शेल्टर हाउस में सोते हैं। टेरी के ग्यारह बच्चे हुये। यह भीड़ उसने वेल्फेयर स्टेट का फायदा उठाने, यानि 18 साल तक प्रत्येक बच्चे का भत्ता पाने के लिए इकट्ठी की थी। बेटियाँ भी माँ के नक्शे-कदम पर चल रही हैं। उसके बेटे पीटर और जेम्स भी कूपन बेच क्लब में आते हैं और शराब के नशे में इतने बेहाल होते हैं कि लड़कियां पैसे निकाल लेती हैं और कर्मचारी उन्हें क्लब के बाहर फेंक देते हैं।

उनकी ‘कमरा न.- 103’  में खाते-पीते प्रवासियों का मानसिक दारिद्रय चित्रित है। प्रवासी अक्सर नौकर, डे-केयर और बेबी-सिटर का खर्च बचाने के लिए देश से माँ-बाप को बुलाते हैं। स्वार्थ और कमीनापन यहाँ तक है कि माँ बाप की जायदाद भी हथिया लेते हैं। उनका हैल्थ इन्श्युरेंस नहीं करवाते। बीमार होने पर सिटी अस्पताल के बाहर ही छोड़ आते हैं कि दवा-दारू के खर्च से बचे रहें। परदेस मे मिसेज वर्मा एकदम अकेली हैं। उनके अंदर की जीने की इच्छा को जीवन संघर्ष और अपनो की उपेक्षाओं ने छीन लिया है। बेटा-बहू सब हथियाने के बाद घर में लगे जाले की तरह उन्हें उतार फेंकते हैं, मिसेज वर्मा अस्पताल मे अर्ध-कोमा की स्थिति मे पहुँच जाती हैं।  

उनकी ‘केतलीना’ की अठारह वर्षीय केतलीना पढ़ना चाहती है, पर डेनमार्क की मजदूर माँ और हैफ फादर के पास पैसे नहीं हैं। ऐसे में वह भारत आ अपने मृत पिता के परिवार से संपर्क करती है। दादी, ताया, बुआ सब उसे दिल से अपनाते हैं। स्नेह देते हैं और उसकी पढ़ाई का खर्चा उठाने की जिम्मेवारी लेते हैं।
अर्चना पेन्यूली की ‘अनुजा’  कहानी अनुजा के जीवन की त्रासदी लिए है। हरिद्वार से डेन्मार्क पहुँच कर अनुजा को पता चलता है कि नदी के उस पार दिखने वाली घास सदैव हरी नहीं होती। उसे सफाई कर्मचारी का काम भी करना पड़ता है। वैधव्य, प्रवासी जीवन, पराई धरती, बच्चों के पालन पोषण का दायित्व, दारिद्रय– उसे अनवरत क्रंदन में छोड़ जाते हैं। दिव्या माथुर की ‘बचाव’  कहानी उस स्त्री का चित्रण करती है, जिसके लिए देश या विदेश सब यातना शिविर है। सब विसंगत है। सर्वत्र आकाश से गिरा खजूर पर अटका वाली स्थिति है। उन्होने ब्रिटेन की रंगीनी नहीं, धूमिल छवि प्रस्तुत की है। निम्न मध्यवर्गीय निंदिया अपनी सहेली रूपा शाह की मदद से असंगत वैवाहिक रिश्ते से बचाव के लिए इंग्लैंड पहुँचती है, लेकिन पराई ज़मीन की विसंगतियाँ और भी वीभत्स हैं। निंदिया तीन सौ पाउंड के सीमित वेतन से जीवन यापन करने के लिए विवश है। गरीबी इतनी कि वह खिड़की पर लगे बड़े साइज़ के मैले चीकट पर्दे को इसलिए नहीं काट पाती कि कल को कमरा बदलना पड़ा और खिड़की बड़ी हुई तो नया पर्दा कहाँ से लाएगी। ठंड के दिनों में निदिया सड़क और स्टेशन पर भिखमंगों को गर्म कोट, मफ़लर, दस्ताने पहने देखती है तो अपना कम वेतन मन:स्थिति को दयनीय बना देता है। सर्दी से बचाव के लिए पुराना कोट लेती है, तो धीरु बहन उसे किसी मृतक का कहकर सिहरा देती है। आकसफेम से जूते, दस्ताने, मफ़लर आदि खरीदती है, पर उन्हें पहनते ही असहज हो उठती है। दोपहर को लोग भोजन करते है और वह तले आलुओं से पेट भरती है। एक स्वप्न है कि निदिया अलग घर लेगी, जब चाहेगी बत्ती बुझाएगी, मनपसंद संगीत सुनेगी, माँ- बाबूजी को स्वेटर और पैसे भेजेगी। निदिया जैसे आपातकालीन कर्मचारियों को बीमारी पर छुट्टी तो क्या, सप्ताहांत पर वेतन भी नहीं मिलता। जरूरी नहीं कि प्रवास स्वप्न पूरे ही करे, वह पाताल में भी धकेल देता है। यहाँ आकर या तो लोग समझौते कर लेते हैं या मन: रोगी से बनकर असाध्य शारीरिक रोग भी पाल लेते हैं।
अपनी पहचान खोना प्रवासी को कुंठित कर रहा है। शैलजा सक्सेना की ‘उसका जाना’  में बेकारी ने मामा चंदर को विदेश का रास्ता दिखाया था और सुनहरे भविष्य का स्वप्न देखते पिता भी सपरिवार यहाँ आ गए। भारत में पिता जिस दवाइयों के कारखाने में काम करते थे, वहाँ उनके नीचे आठ लोग थे लेकिन यहाँ उनकी शैक्षिक योग्यता या अनुभव सब बेकार हो गए हैं। उन्हें ड्राइवरी सीखकर ट्रक चलाना पड़ा। भारतीय सोच के अनुसार वे सम्मानित से सामान्य, मध्य से निम्न, प्रशिक्षित से अशिक्षित, अधिकारी से कर्मचारी वर्ग में स्थानांतरित हुए हैं। अपने इसी अवमूल्यन के कारण शांत स्वभाव के पिता अब घर खर्च पर चिल्लाते हैं, माँ को जानवरों की तरह पीटते हैं और अमेरिका से पाया एड्स का उपहार माँ को भी भेंट कर देते हैं। यहाँ-वहाँ हम देखते हैं कि प्रशिक्षित इंजीनियर, डॉक्टर टैक्सी चलाते हैं, ढाबों में काम करते हैं। बैंक ऑफिसर सफाई कर्मचारी का काम करते हैं। इला प्रसाद की ‘लौटते हुये’ का डॉ. पुलिन वहाँ घंटों के हिसाब से मजदूरी करता है।


बच्चे इस दारिद्रय के सर्वाधिक शिकार हैं। उषा देवी कोल्हटकर की ‘मेहमान’  में माता-पिता के जुल्मों के कारण ट्रेसी को फास्टर पैरेंट्स के यहाँ रहना पड़ रहा है। फास्टर माँ ने सरकार से मिलने वाले पैसों की खातिर उसे रखा हुआ है। उसे खाना तक नहीं देती छुट्टी के दिन ट्रेसी किसी के घर काम करके भोजन जुटाती है। उषा वर्मा की ‘रौनी’  में भी फास्टर पैरेंट्स के यहाँ भटक रहा, अभावों और अमानवीय अत्याचारों में जी रहा बच्चा है। उषा राजे सक्सेना की ‘मेरा अपराध क्या है’ की स्टेला जानती है कि माँ के लिए वह और उसके भाई-बहन मात्र चिल्ड्रेन अलाउंस और सोशल लाभांशों के मोहरे हैं। अनाथालयों से बार-बार विस्थापन और असुरक्षा ही उसकी नियति है। इला प्रसाद की ‘दर्द’ में भी 18 साल की उम्र तक मिलने वाले वेलफ़ेयर स्टेट अलाउंस के कारण ही माँ बच्चों को अपने पास रख रही है। काले समुदाय की एंजेला और उसके चार भाई-बहन अपनी अविवाहित माँ के साथ इसी कारण रह रहे हैं। माँ एक रेस्तरां में वेट्रेस है। एंजेला जैसे ही अठारह की होती है, अलाउंस बन्द होता है, माँ उसे घर से निकाल देती है। वह एक ब्यूटी पार्लर में सफाई कर्मचारी की नौकरी करती है और फिर बाल काटना सीख लेती है। प्रेमी डॉन के चले जाने पर वह लंगड़े थॉमस के साथ उसको मिलने वाली सरकारी सहायताओं के कारण रहने लगती है। थॉमस की नौकरी छूट जाने पर उसे बर्दाश्त करती है और मकान मालिक मैक्स से भी कभी मौज मस्ती के लिए और कभी दवा आदि के लिए डॉलर जुटा किसी तरह सरवाइव कर रही है।

उषा राजे सक्सेना की ही ‘वह रात’ में गरीबी और दारिद्रय के बीच जिया जाने वाला अभावग्रस्त जीवन चित्रित है। बिना हीटिंग के बर्फीला घर है। बिना केयरटेकर के बच्चे- नौ वर्षीय एनीटा, आठ वर्षीय मार्क और चार-चार साल की रेबेका और रीटा है। जिस्मफरोशी करने वाली औरतों और उनके बच्चों को पड़ोसियों से मिलने वाली नफरत है। माँ का कत्ल होते ही चारों बच्चे सेंट वेलेंटाइन चिलड्रन होम भेजे जाते हैं और वहाँ से अलग-अलग संरक्षकों के यहाँ भेज दिये जाते हैं। कहानी उन भारतीय मूल्यों के अवमूल्यन के पुनर्मूल्यांकन के लिए खिड़कियाँ खोल रही है, जो कहते हैं कि विदेशो मे पैसा है, रोज़गार है, समृद्धि है और इनसे सारे सुख खरीदे जा सकते हैं। उनकी ‘और जल गया उसका सर्वस्व’  में गोपाल और सचिन के माध्यम से अवैध रूप से लंदन में रह कर इस-उस के रेस्टोरेन्ट/बार में काम करने वाले, रात को वहीं किचन में छिपकर सोने वाले, गायिका, बलात्कार पीड़िता, अवैध बच्चे की माँ शोबना से शादी कर अवैधता से छुटकारा पाने वाले, कौंसिल के टूटे फूटे खस्ताहाल फ्लैट में हँसी-खुशी रहने वाले, चौकीदारी की नौकरी को उपलब्धि मानने वाले लोग हैं।

गरीबों को कोई जीने नहीं देता। दिव्या माथुर की खल्लास  की नीरा ब्रिटेन के शहर हार्ल्सडन में अपनी माँ के साथ रहती है। एक ओर जॉनी जैसे गुंडों की नज़र उस पर है तो दूसरी ओर जमाइमा फरीद उसे वेश्यावृति के धंधे में धकेलना चाहती है। नीरा त्यागी की ‘कदम बढ़ाए जा’ की स्मिता को गर्भावस्था के बावजूद भरी ठंड मे बड़े-बड़े थैलों मे घर का सामान ढोना पड़ता है।
गरीबी और दारिद्र्य से जूझ रहे लोगों द्वारा सेल की प्रतीक्षा भी उस संस्कृति का एक हिस्सा है। सुषम के यहाँ सर्दी से ठिठुर रहे पिता की जुराबों के लिए सेल की प्रतीक्षा की जाती है। बहुत जरूरी होने पर भी लोग चीज़ें खरीदते नहीं, सेल की प्रतीक्षा करते हैं। सेल अमेरिकी कल्चर का हिस्सा है- थैंक्स गिविंग सेल, क्रिसमिस सेल, आफ्टर क्रिसमिस सेल। इला प्रसाद की ‘सेल’ में लोग अपनी पुरानी चीजों की गराज में ही सेल लगा देते हैं। सुमि थैंक्स गिविंग सेल से डेढ़ सौ डॉलर मे 42 इंच का टी. वी. खरीदने के लिए कंपाने वाली सुबह को चार बजे लाइन में जा लगती है कि बेटियाँ प्रसन्न हो जाएंगी।


एक बात स्पष्ट है कि यहाँ और वहाँ की गरीबी में अंतर है। यह उस धरती की गरीबी है, जहाँ खाने के कूपन, गुजारा भत्ता, आवास की सुविधा सरकारी खाते से मिल ही जाती है। दूसरी बात कि पराई धरती पर अपनी पहचान खोने के बाद, दायित्व की प्रबल पीड़ा को समझते लोग सब तरह के समझौते करना सीख जाते हैं। सिर्फ जिजीविषा प्रमुख रह जाती है। इसीलिए सफेदपोश और प्रशिक्षित लोग भी बेबी सिटिंग करके, घास काट कर, बर्फ साफ करके, ड्राइवरी करके, ढाबों में काम करके, मजदूरी करके, वाशरूम साफ करके- जीने का जुगाड़ कर रहे हैं। सब चमकने वाली चीजें सोना नहीं होती और लेखिकाओं ने प्रवासियों के उस मानसिक दारिद्र्य को भी अंकित किया है, जब वे बेबी सीटर, डे केयर नौकर का खर्च बचाने के लिए देश से माँ-बाप को बुलाते हैं और उनका हैल्थ इंश्योरेंस तक नहीं करवाते। बीमारी की हालत में अस्पताल के आस-पास छोड़ चलते बनते हैं। वहाँ के लोकल्ज़, खासकर काले लोगों का दारिद्रय भी यहाँ मिलता है। वेल्फेयर स्टेट का एक अपना ही बाजारवाद है। बच्चे माँ-बाप या संरक्षकों द्वारा ममत्व या उत्तरदायित्व के कारण नहीं, सरकारी अलाउंस की सुविधा के कारण रखे जा रहे हैं। पैसा, रोजगार, समृद्धि इन कहानियों में बड़े झूठों की तरह चित्रित हैं।  






सन्दर्भ-
1. उषा प्रियम्वदा, मछलियाँ, धर्मयुग,  अप्रैल 1964
2. वही,  शून्य, शून्य और अन्य कहानियाँ, राजकमल, दिल्ली, 1996  
3. सुषम बेदी, चट्टान के ऊपर चट्टान के नीचे, तीसरी आँख, पराग, दिल्ली, 2016
4. सुधा ओम ढींगरा, सूरज क्यों निकलता है, कमरा नम्बर 103, हिन्दी साहित्य निकेतन, बिजनौर, उत्तर प्रदेश, 2013
5. वही, कमरा नम्बर 103
6. वही, केतलीना, कथादेश, सहयात्रा, दिल्ली
7. अर्चना पेन्यूली, अनुजा, हंस, जून 2005
8. दिव्या माथुर, बचाव, पंगा तथा अन्य कहानिया, मेघा बुक्स, दिल्ली, 2009
9. शैलजा सक्सेना, उसका जाना, साहित्य कुंज, 22 फरवरी, 2014
10. इला प्रसाद, लौटते हुये, हंस, जनवरी 2008
11. उषा देवी कोहल्टकर, मेहमान, शोध दिशा,, जुलाई-सितंबर 2010  
12. उषा वर्मा, रौनी, अभिव्यक्ति, 28 अप्रैल, 2012
13. उषा राजे सक्सेना, मेरा अपराध क्या है, अभिव्यक्ति, 24 मार्च 2008  
14. इला प्रसाद, दर्द, तुम इतना क्यों रोई रूपाली, भावना, दिल्ली-91
15. वही, वह रात, वह रात और अन्य कहानियाँ, सामयिक, दिल्ली, 2007
16. वही, और जल गया उसका सर्वस्व, कथाबिंब, जनवरी-जून 2014
17. दिव्या माथुर, खल्लास, पंगा तथा अन्य कहानियाँ, मेघा बुक्स, दिल्ली, 2009
18. नीरा त्यागी, कदम बढ़ाए जा, पुरवाई, जनवरी- मार्च 2011
19. इला प्रसाद, सेल, गद्य कोश, http://gadyakosh.org/gk


- डाॅ. मधु संधु

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