जुलाई 2015
अंक - 5 | कुल अंक - 53
प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

जगमगाता रहेगा 'सूरज'
जहाँ जीवन की विषमताओं, समाज की कुरीतियों, व्यर्थ के दंगे-फ़साद, न्याय-अन्याय की लड़ाई, अपने-पराए, रिश्ते-नाते, ईर्ष्या, अहंकार और ऐसी ही तमाम विसंगतियों में उलझकर, जीना दुरूह होता जा रहा है वहीं कुछ ऐसे पल, ऐसे लोग अचानक से आकर आपका दामन थाम लेते हैं कि आप अपनी सारी नकारात्मकता त्याग पुन: आशावादी सोच की ओर उन्मुख हो उठते हैं. बस, इसी सोच को सलामी देने के लिए हमारे इस स्तंभ 'अच्छा' भी होता है!, की परिकल्पना की गई है, इसमें आप अपने या अपने आसपास घटित ऐसी घटनाओं को शब्दों में पिरोकर हमारे पाठकों की इस सोच को क़ायम रखने में सहायता कर सकते हैं कि दुनिया में लाख बुराइयाँ सही, पर यहाँ 'अच्छा' भी होता है! - संपादक
--------------------------------------------------------------------------
 
सूरज को जन्म देते समय उसकी माँ की मृत्यु हो गई थी। पिता भी एक सड़क दुर्घटना में मारे गये। उन्हें किसी नशेबाज ने बाइक से रौंद डाला। तब सूरज महज़ डेढ़ साल का था। उसकी परवरिश उसकी बूढी दादी और उससे चार साल बड़े भाई राजा ने की। अभी सूरज की उम्र महज़ आठ साल ही है। एक वर्ष पहले नियति के क्रूर हाथों ने उसका एकमात्र सहारा, उसकी दादी को भी छीन लिया। सूरज और राजा, दादी की मृत्यु पश्चात गाँव के लोगों का बेगार खटते और अपना पेट भरते। कुछ दिन ऐसा ही चलता रहा। एक दिन राजा और सूरज को किसी शराब व्यवसायी ने अपनी शरण में ले लिया। लोगों को ब्लैक में दारु मुहैय्या कराना, उनके लिए चिखना लाना, सिगरेट लाना और एक दो सुट्टे खुद भी लगा लेना, दिन यूँ ही कट रहे थे। एक दिन एक शराबी ने किसी बदइन्तजामी को लेकर इन दोनों भाइयों को खूब पीटा। शराब व्यवसायी मूक बना देखता रहा। उस रोज़ दोनों भाई मायूस होकर गाँव की तरफ लौटने लगे लेकिन  वो व्यवसायी उन्हें जाने देना नहीं चाहता था। फोकट में दो-दो कर्मठ कर्मचारी कौन हाथ से जाने देना चाहता है। खैर! मेरे एक मित्र उस समय उसी रास्ते से गुजर रहे थे, संयोगवश ये बच्चे उन्हीं के गाँव के थे। शराब व्यवसायी मेरे मित्र को भली-भांति जानते थे क्योंकि मित्र एक प्रतिष्ठित परिवार से थे और स्थानीय लोग भी उनके परिवार की इज्जत करते थे।
 
मेरे मित्र की दखलंदाजी से दोनों भाई मुक्त हुए। राजा, जिसकी उम्र लगभग 13 साल है, उसने मित्र के पैतृक निवास अपने गाँव ही रहना पसंद किया। उसके हिस्से में दो गाय की सेवा सौंप दी गई। पढाई के लिए भी राजा बड़ी मुश्किल से तैयार हुआ। अब वो एक परिवार के सदस्य की हैसियत से वहां रह रहा है। 
राजा, बेबाक, मासूम और चंचल स्वभाव का है। फिलहाल वो मेरे मित्र के साथ पटना आ गया है। अब राजा गाँव लौटना नहीं चाहता. मित्र के पुत्र ने जब पढाना शुरू किया तो पता लगा कि सूरज भी कुशाग्र बुद्धि का है। कुछ ही दिनों में उसने अभिवादन के अंग्रेजी जुमले कंठस्थ कर लिए हैं। अब पास के एक सरकारी स्कूल में उसका नाम लिखवा दिया गया है। मिड सेशन के कारण डी ए वी ने एडमिशन लेने से मना कर दिया। सूरज उतना ही काम करता है जितना किसी घर का कोई बेटा करता है। सूरज अपनी जिद वैसे ही रखता है जैसे कोई बच्चा अपने माँ-बाप पर रखता है।
 
सूरज और मेरे बेटे आलाप में गहरी दोस्ती हो गई है। आज सूरज, मित्र परिवार के साथ हमारे घर आया। हम चाहे लाख स्वायत्ता दे दें लेकिन एक झिझक जो इस मासूम के मन में बैठ गई है वो कभी नहीं निकलेगी। लाख बोलने पर भी सूरज खाने की टेबिल पर नहीं बैठा। उसने अपनी थाली ली और फर्श पर बैठ गया। आलाप को बहुत बुरा लगा। उसने थाली उठाई और सूरज के पास जाकर बैठ गया। मैं चाहता हूँ उनकी दोस्ती बरकरार रहे और उनका प्रेम यूँ ही बना रहे। आलाप की जिद पर उन दोनो की एक तस्वीर भी ली थी और उसके बाद दूसरी तस्वीर लिए बिना मेरा मन नहीं माना। मैं भी आलाप जैसा ही था लेकिन अब शायद इतना निष्पाप नहीं रहा।
 
आशान्वित हूँ, कि सूरज जैसे बच्चों के लिए मेरे मित्र जैसे और भी कई लोग आशा की किरण बनकर आएँगे और उनका जीवन रोशन करेंगे !

- प्रशांत विप्लवी

रचनाकार परिचय
प्रशांत विप्लवी

पत्रिका में आपका योगदान . . .
कथा-कुसुम (1)विशेष (1)