जुलाई 2015
अंक - 5 | कुल अंक - 53
प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

प्रकृति संग आयाम रचता जन-साहित्य 'बुराँस की तरह': अमिय प्रसून मल्लिक
 
 
 
नवीन नौटियाल की 'बुराँस की तरह' आधुनिक काव्य-जगत में ज़ोरदार दस्तक है। नये कवियों के प्रतिस्पर्धी माहौल में शालीनता से अपनी मुकम्मल जगह और पैठ बनाती उनकी यह किताब कई आशावादी पहलुओं की ओर ध्यान खींचती है। भरसक उधर भी, जिसे कई उदीयमान कवि काव्य का सामयिक विषय बनाने को हिचकते हैं।
पेशे से शिक्षक और ज़मीनी हक़ीक़त से गहरे जुड़े नवीन जी प्रकृति और उससे जुड़ी असलियत से ही अपने काव्य के मायने रचते हैं और कमोबेश उसी में अपने अस्तित्व को प्रक्षेपित हुआ देखते हैं। उनके काव्य का विषय भी मूलतः 'प्रकृति' या उसके आस-पास का झकझोरने वाला पहलू ही है, जो शब्दों का अद्भुत और ज्वलंत तारतम्य बुनता है और उनका अनोखा संग्रह कर पुस्तकाकार में अपनी उत्पत्ति दर्ज़ करता है।
 
तकरीबन 120 कविताओं से सजी यह छोटी-सी पुस्तक बड़ी आशा जगाती है। आशा और उम्मीद इस बात की कि आधुनिक साहित्य में भी सम्भाव्य है, और साथ ही इस तथ्य को लेके भी, कि कई रचनाएँ अगर पाण्डुलिपि तक ही सीमित हों तो भी उन्हें कमतर नहीं आँका जाए।
यों कि पिछले कई महीनों में सोशल मीडिया और ऐसे ही कई 'प्लेटफॉर्म्स' के सहयोग से कई काव्य- संग्रह ( एकल व साझा) आये, पर ज़्यादातर में छपास की बू ही साहित्य का गला घोंटने का काम करती रही। कुछ ने 'फेसबुक' पर जितनी तारीफ़ें बटोरीं और 'बेस्ट सेलर' की लिस्ट में शामिल होने को तड़पती रहीं, उनकी रचनाओं से ही उनके स्तर का पता लगाया जा सकता है। सौभाग्य से, ऐसे दौर में नवीन जी उम्मीद की इक तेज लौ लेकर आते हैं और अपनी छोटी और बिला-वजह की 'मार्केटिंग' से परे अपनी सटीक मौजूदगी तय करते हैं। आपकी कविताओं में प्रकृति का इतना सुन्दर और सरल चित्रण मिलता है कि पाठक न चाहते हुए भी अगली रचनाओं की ओर बढ़ता चला जाता है।
 
पुस्तक की शुरुआत ही शीर्षक कविता से होती है, जिसका उत्तरार्द्ध अतिशय कचोटने वाला है:
 
''सोचा तो था
कि मेरे सपने भी खिलें
बुराँस की तरह
जो दिखाई दे सभी को दूर से
ठीक बुराँस के फूल की तरह
लेकिन/परिस्थितियां अड़ी थीं मेरे आगे
बाँज के जंगल की तरह...''
 
वैसे ही, 'कविता: एक अस्तित्व' में सच्चाई का बड़ा सालने वाला चित्रण मिलता है,
 
''जब कविता दिखाती है
खेतों- खलिहान के हालात को
गाँवों की असामान्य व्यवस्था को
कुपोषण को, भूख को
आत्महत्या करते किसानों को,
तब/ कविता पर ही तन जाती हैं लाठियाँ
निर्दोष कविता कुछ नहीं कहती है
बस चुप रहती है...''
 
पर इनका काव्य आगे भी चीत्कार करता रहता है, और अपनी आवाज़ बुलंद करने के हर मौके की तलाशी में मगन आज की पीढ़ियों की कमियों को भी सिसकता है, जो 'क्या हमारे बच्चे देख पाएँगे?' में बड़ी ख़ूबसूरती से उकेरा गया है;
 
''गेहूँ- जौ के खेतों में
फैली हरियाली को देखकर
मन करता है कि कुछ देर रुक जाऊँ यहीं
जी भरकर देखूँ इसे या ले जा सकूँ
फेफड़ों में भरकर इस ताज़ा हवा को
या नथुनों में भरकर ही ले जाऊँ
सरसों के फूलों की तैलीय सुगंध को...''
 
प्राकृतिक पहलुओं से इतने सुन्दर छंद आज लिखने की हिम्मत कौन करता है! नवीन जी ने इसे ही अपना सबसे बड़ा विषय गैर-इरादतन घोषित किया हुआ है। वो पहाड़ी वादियों में विचरते हुए कुदरती उपमाओं और अलंकारों से अपनी कविताओं को सजाते हैं। शीर्षक कविता से प्रेरित एक छंद चौंकाने वाली परिस्थिति में आपको पहुंचाता है, और काव्य- सुखन के शौक़ीन को सोचने को एक ज्वलंत सवाल दे जाता है,
 
''जंगल में बुराँस है,
तो कुछ दिन और टिके
रहेंगे जंगल,
खुराफ़ाती सोचेंगे,
कि इस जंगल में तो
लगी है आग पहले से ही
चलो, कहीं और चलते हैं.''
 
नवीन जी करुण रस में भी माहिर हस्ताक्षर हैं। उनकी एक कविता 'बहुत दिनों से' जो गीत रूप में सम्मिलित है, इसका सटीक समर्थन करती है-
 
''आँखों में ही अटके रहे आँसू
गिरे भी नहीं, सूखे भी नहीं
तेरे इंतज़ार में बैठे हैं अब तक
रूठे भी नहीं, टूटे भी नहीं...''
 
काव्य का इतना कलात्मक और 'रियलिस्टिक' चित्रण नैसर्गिक रूप से एक ज़िंदा शख्स ही कर सकता है। जो खुद जीता है और खुद में हर परिस्थिति को जीता है और सारे हालात को ज़िन्दा बनाये रखने की जुगत में सुखन को प्रेरित होता रहता है। सच तो यह है कि काव्य-सुखन वालों के पास बस शब्द ही एकमात्र रास्ता होता है, जिससे चलकर वो अपने एहसासों का अपने अंदर ख़ाका खींचता है और नवीन जी ने इस तथ्य को बड़ी शालीनता से अपनी प्रायः रचनाओं में उकेरा है।
 
आपकी ज़्यादातर रचनाएं ज़िन्दगी और उससे जुड़ी विसंगतियों का प्रकृति के परिप्रेक्ष्य में समर्पित चित्र हैं, जिनमें हम खुद को देखते और जीने लग जाते हैं। जैसे- जैसे काव्य पाठ का आरोहण होता हैं, हमारी अनुभूतियाँ उन कविता विशेष में ख़ुद को शब्दाकार होते ढूंढना शुरू करती हैं, और मेरी समझ में यही एक कवि और उसकी सर्जनात्मकता की सार्थकता है।
 
इन बातों के अलावा नवीन जी की इस पुस्तक की ज़्यादातर रचनाएँ निर्विवाद रूप से पठनीय है तथापि कुछ रचनाओं के विषय श्लाघनीय होते हुए भी उनमें उत्तरोत्तर कसाव की कमी खटकती है। यहाँ नवीन जी को रचनाओं के चयन में जल्दबाज़ी से बचना चाहिए; पर फिर भी, हो सकता है, अन्य रचनाकारों की किसी बहुप्रतीक्षित किताब की तरह आपकी किताब लोकप्रिय न हो, या तथाकथित 'बेस्ट-सेलर' की सूची में शामिल न भी हो, पर यह संग्रह अपने-आप में समृद्ध रचनाओं का पूरा संसार है, और इतने होनहार संकलन को भौतिक आकांक्षाओं की ज़रूरत बहुधा न ही कभी पड़ती है, न वो ऐसी बातों में अपने सुखन को प्रभावित होने ही देता है। सो, जो पढ़ने को तज़ुर्बाई तवज्जोह देते हैं, उनकी सूची में आपकी किताब एक अप्रतिम अंक जोड़ेगी।
 
और चलते- चलते, कोलाहल से भरे माहौल में सादगी से लिपटी आपकी ज़िन्दगी आपको ज़मीन और उससे जुड़ी उम्मीदों से जोड़े रखती है। आप और आपकी शख्सियत का सबसे सशक्त उदाहरण आपकी इस किताब में बड़े क़रीने से आपकी रचनाओं ने ख़ुद ही बताया है। आपकी क़लम और धारदार होते हुए साहित्य की ज्वलंतता को सम्पोषित करे, ऐसी उम्मीद के साथ इसके बाद वाली किताब की चाह बनती है।
 
 
 
 
 
समीक्ष्य पुस्तक- बुराँस की तरह (कविता संग्रह)
रचनाकार- नवीन नौटियाल
समीक्षक- अमिय प्रसून मल्लिक
संस्करण- 2015

- अमिय प्रसून मल्लिक