प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
जुलाई 2015
अंक -52

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

नस्ल
हर कदम पर कोई कातिल है कहाँ जाए कोई
जिन्दा रहना बड़ा मुश्किल है कहाँ जाए कोई?
(फिल्म - अर्जुन पंडित)
बचपन में जब माँ के साथ बस में सफर किया करता था तो बड़ा आनंद मिलता था। हमारा रिश्तेदारों के यहाँ आना-जाना अधिक न था। बस से ज्यादातर हम केवल गाँव ही जाया करते थे। लगभग 300-400 घरों वाला हमारा गाँव मोहम्मदपुर रोही हरियाणा के फतेहाबाद जिले में स्थित है। बस का यह सफ़र मेरे स्मृति–अवशेष में सबसे अधिक प्रिय है। बस जब सुनसान–सी लगने वाली काली पक्की सड़क पर तेज़ दौड़ती तो इसके ढीले–ढाले शीशे आपस में टकराकर संगीत रचते। यह संगीत कितना अतुल्य था, यह केवल बालक मन ही जान सकता है। लेकिन आज समय मानों ब्रेनवॉश करने को तुला है। जाने कब धीरे–धीरे विलय होते हुए यह संगीत जीवन से विलुप्त हो गया, पता ही न चला। आज जीवन इतना व्यस्त हो चला है कि गाँव के कच्चे घरों की महक, वे आग उगलते चूल्हे, आले में बेकार पड़ी वस्तुओं को ढकते मकड़ी के जाले, और खेतों का सीना चीरती पगडंडियाँ मेरे ख़्वाबों का आकार तक नहीं ले पाते। जो कल हृदय के सुकून का कारण थे, आज जाने कौन सी सड़क पकड़ कहाँ चले गए। व्यस्तता ने ऐसे झाड़ उगा दिए कि मन अब नीचे उतरता ही नहीं। स्मृतियाँ अंतरिक्ष की अकूत गहराइयों में कहीं खो गयी हो जैसे।
 
जीवन में बस के दूसरे सफर का अपना एक महत्व है। बल्कि पिछले से ज़्यादा, शायद सबसे ज्यादा। प्रौढ़ता की प्रथम सीढ़ियाँ मुझे यहीं से मिली थी। लेकिन ये इसलिए भिन्न नहीं था कि राजधानी की लोकल बसें हरियाणा की रोडवेज़ बसों के विपरीत चोक ए ब्लोक थी या फिर बस के अंदर उमड़ आई भीड़ धृतराष्ट्र की भुजाओं की तरह तुम्हारी मेरुदण्ड का भुरकुस बनाने को सदैव उतावली लगती हो। नहीं। यह सफ़र भिन्न इसलिए था कि एक बालक और युवा के प्रति समाज की दृष्टि भिन्न होती है। यह दृष्टि इतनी सामान्य नहीं होती जितनी आमतौर पर समझ ली जाती है। इस तथ्य ने मेरी सोच की शिराओं में तब घर किया जब मुझे युवावस्था में बस के सफर का पहला और कड़वा अनुभव प्राप्त हुआ। 
 
उस रोज़ पहली बार रोष की आंच से मेरे भीतर की नसें तपने लगी थी। समाज की घृणित मानसिकता का यह सबसे पहला अक़्स था जो मेरे मस्तिष्क की धमनियों में गहरे से उतर गया था। यह एक दूसरी निगाह थी जो मेरे मन को छील रही थी; जिसे देर-सवेर हर युवा के हृदय पर समाज चौड़ा हो ठोकता है। इनमें में अभागा था जो उनकी प्रत्येक ठोक को अपनी आँखों में खुबता महसूस करता। लेकिन मैं अभागा इसलिए नहीं था कि पहली बार मुझ संग अनदेख–अनसुन विपरीत व्यवहार हुआ, अपितु शायद मैंने बहुत कम उम्र में समाज के इन नंगे और बेशर्म तीरों को भांप लिया था। इसकी पहली निगाह स्नेह की लकीर बन सीने में गड़ती उत्साह का संचार करने वाली थी। किन्तु उसी मनुष्य के लिए दूसरी निगाह इतनी विपरीत क्यों? समाज अपनी दोनों निगाहों में हमें तरोलता। एक में अपार निश्छल स्नेह, दूसरी में केवल ईर्ष्या न कोई प्रेम। किन्तु फिर भी यह दूसरी निगाह हमारे अहम को चाखती (यह शब्द चखती नहीं है)। इसके हर एक चटकारे में हमारे सुकून के धागे बिटखने लगते। हम उनके भोजन का हिस्सा हैं:  महज़ एक स्टेपल डाईट, जिसे न छूकर वे छन – छन चबाते न अफरते हैं। हत्क का यह सारा खेल मुझे उस रोज़ समझ आ गया था।
 
घटना इतनी छोटी न थी कि मुझ–से मन-ही-मन अपना थूक गिटक लेवे। इस पाले के लोग बेवकूफ न थे। शक्ल से उजड्ड–गंवार। अगले जो लोग इनका शिकार होते, वे उनके अनकहे शब्दों को नपुंसकों की तरह अपने कान के पर्दे की झिल्लियों में घूं करते महसूसते। उनके बुनकर मस्तिष्क आँखों के मार्फ़त हत्क के कसीदे गढ़ते, और मुझ–से केवल चुपचाप पढ़ते। लेकिन हत्क की इस तिल्ली से जो आग बलती वह दिन–दिन उनके जी खाती। एक हल्का–सा स्पर्श इनके रौंगटे खड़े कर देता। इस खौफ ने इनको लीदड़ बना दिया – एक डरपोक नस्ल..!
 
 

- रोनी ईनोफाइल
 
रचनाकार परिचय
रोनी ईनोफाइल

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