अगस्त 2017
अंक - 29 | कुल अंक - 55
प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

ग़ज़ल-गाँव

ग़ज़ल-

ज़िद पे उतरा है जो सूरज के जला लेगा बदन
शाम को देखना दरिया में बुझा लेगा बदन

मैंने वो इल्म सिखाया है उसे ख़्वाबों का
अब तस्सवुर की वो मिट्टी से बना लेगा बदन

जिस तरह से तू निशाने पे मेरे आया था
मुझको खटका तो हुआ था तू हटा लेगा बदन

मुतमईन हूँ मैं मेरी ज़ात से लेकिन फिर भी
मुतमईन इतना नहीं कोई चुरा लेगा बदन

सुन मेरे अहले जुनूं तू अभी चुपचाप ही रह
फिर किसी और ही मुश्किल में फँसा लेगा बदन

आज तक जिसने उसे देखा है बस ज़ेहन दिखा
देखना ये है कि किस दिन वो निकालेगा बदन


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ग़ज़ल-

हर वक़्त वही ज़ेहन से इक उलझा हुआ ख़्वाब
ये आप हो या फिर से कोई उतरा हुआ ख़्वाब

लो देख लो सबकुछ तो खुले आम पड़ा है
ये शक्ल है, ये आँख है, ये रक्खा हुआ ख़्वाब

उस दिन से मेरे दीद की हैं उँगलियाँ जख़्मी
पानी समझ के छू लिया था जलता हुआ ख़्वाब

नींदें ले उड़ीं आँखों को बिस्तर से कहीं दूर
और छोड़ गयीं पास मेरे जगता हुआ ख़्वाब

सुन ले रे ओ ताबीर, इसे साथ में ले जा
किस काम में आएगा ये अब टूटा हुआ ख़्वाब

ये शर्त हमारी भी है और फ़िक्र की भी है
जो दिल को मेरे पहले छूए, उसका हुआ ख़्वाब

अब यूँ ही नहीं कहती है दुनिया मुझे पागल
मेरी ही तरह वहशी मेरा, देखा हुआ ख़्वाब

समझाऊं भी तो कैसे तुम्हें दर्द की शिद्दत
तुमने तो कहाँ देखा कभी मरता हुआ ख़्वाब

पहले तो मैं ही फैंकता हूँ तोड़ के सावन
फिर खुद ही उठा लाता हूँ वो फैंका हुआ ख़्वाब


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ग़ज़ल-

रोज़ के रोज़ कुछ नया करना
सख़्त मुश्क़िल है तज्रिबा करना

हिज्र हम दिन ही दिन का रक्खेंगे
तुम न रातों को सो लिया करना

बस यही काम है हमारा अब
अपने होने पे तब्सिरा करना

पहले दुनिया को कोसना जी भर
और फिर ख़ुद पे हँस लिया करना

धीरे-धीरे तुम्हें समेटें हम
धीरे-धीरे ही तुम खुला करना

मेरे मेयार को गिराता है
चीज़ होते हुए मना करना

हम यही सोच कर ख़मोश रहे
कल के बच्चों पे तंज़ क्या करना

जा रहा हूँ मैं फ़िक्र तक उसकी
लौट आऊँ ये तुम दुआ करना

एक ख़ेमा हताश निकलेगा
कितना मुश्किल है फ़ैसला करना

तेरा मुझको यूँ छोड़कर जाना
मौत को ज़िन्दगी अता करना


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ग़ज़ल-

हिज्र को वस्ल के इमकान बताते हुए हम
यूँ ही मर जाएँ तेरा इश्क निभाते हुए हम

डर-सा रहता है कि क्या होगा अब इन आँखों का
देख आये हैं कोई हुस्न नहाते हुए हम

वो शरारे-सा बदन दहके से रुख़सार-ओ-लब
जी तो करता है कि जल जाएँ बुझाते हुए हम

उसने आँखें थीं किसी और तरफ फेरी हुईं
रो पड़े उसकी वो तस्वीर बनाते हुए हम

इतने कमज़ोर सिपाही थे कि उस लश्कर पर
अच्छे लगते नहीं, शमशीर उठाते हुए हम

पहले हम ही तो थे आमादा, मुहब्बत कर लें
भागते फिरते हैं अब जान छुड़ाते हुए हम

इतने मीठे-से थे वो साथ गुज़ारे हुए पल
हँसने लगते हैं तेरा दर्द जगाते हुए हम

फ़ीका कर बैठे थे रंग-ए-तअल्लुक अपना
और ज़ियादा ही असरदार बनाते हुए हम

अब वहाँ दश्त न सावन न कोई क़ैस बचा
पाये जाते थे जहाँ ख़ाक उड़ाते हुए हम


- सावन शुक्ला

रचनाकार परिचय
सावन शुक्ला

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ग़ज़ल-गाँव (1)