प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
मार्च 2015
अंक -52

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

लघुकथा- चोर
चोर...! चोर...! पकड़ो...! पकड़ो...की आवाज़ सुनकर मैंने पीछे मुड़कर देखा तो कुछ लोग बारह-तेरह साल के एक किशोर के पीछे भाग रहे थे। मेरे देखते ही देखते उन लोगों ने उसे पकड़ लिया और घेर कर लात-घूंसों से उसकी पिटाई करने लगे। कुछ मानव स्वभाव और कुछ जिज्ञासावश मैं भी दौड़कर उस तरफ गया और भीड़ का हिस्सा बनकर मामले को समझने की कोशिश करने लगा। मैंने देखा कि किशोर बिना कुछ कहे चुपचाप सिर्फ पिटे जा रहा था। उसकी फटी हुई कमीज़ और अधिक फट गई थी और शरीर पर चोट के निशान नज़र आने लगे थे। मुझे उसके निरीह चेहरे पर दया आ गई और मैं भीड़ में जगह बनाता हुआ उस तक पहुंचा। लोगों से उसे छुड़ाने की कोशिश करते हुए मैंने ज़ोर से कहा- “बस करो! पीट-पीट कर मार डालोगे क्या? ऐसा क्या चुराया है इसने? जो भी चुराया है, इसके पास ही होगा। जिसका है ले लो और जाने दो बेचारे को।"
“बहुत शौक है ना समाज सुधार का? तुम्हारा कुछ चुराया होता तो पता चलता।" एक कुछ धनाढ्य से दिखने वाले व्यक्ति ने हिकारत से बच्चे की तरफ देखते हुए कहा। शायद बच्चे ने इसी का कुछ चुराया होगा। मैंने अनुमान लगाया।
उस व्यक्ति ने जबरदस्ती उस डरे-सहमे बच्चे की कस कर बंधी हुई मुट्ठी को खोला। मुट्ठी में एक बिस्कुट का पैकेट था जो शायद उस व्यक्ति ने अपने पालतू कुत्ते के लिए खरीदा होगा। वही छीन कर भागा था वो। उस मासूम को शायद अंदाज़ा भी नहीं होगा कि कुत्तों को भी बिस्कुट खिलाये जाते हैं।
दृश्य देखकर भीड़ बगलें झाँकती इधर-उधर हो गई। मेरे कदम मानों जमीन से चिपक गये। मानवता उस बच्चे की सूरत में सिसक-सिसक कर अपने गिरते स्तर की कहानी कह रही थी।

- आशा शर्मा
 
रचनाकार परिचय
आशा शर्मा

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कथा-कुसुम (1)