Hastaksher
प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
महिला ग़ज़ल अंक
अंक -40

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

मूल्यांकन

एक अच्छे ग़ज़लकार की झलक देता संग्रह 'किनारे बोलते हैं'
- के. पी. अनमोल


 




'किनारे बोलते हैं' सुनीता काम्बोज जी का ग़ज़ल संग्रह है, जो वर्ष 2017 में अयन प्रकाशन से छप कर आया। पिछले दिनों इस संग्रह से गुज़रा तो इसके रचनाकार में एक अच्छे ग़ज़लकार की झलक देखने को मिली। आम पाठक को आसानी से समझ में आने वाली भाषा में सुनीता जी अपने परिवेश की सामान्य-सी बातों को अशआर में ढालती हैं। इनके पास आम व्यक्ति के जीवन से जुड़े अनुभवों को क़रीब से मेहसूस कर पाने की क्षमता है। वर्तमान सामाजिक-राजनीतिक परिदृश्य के प्रति चिन्ता, पर्यावरण चेतना, समाज में नारी की दशा और उसकी शिक्षा-सजगता की ज़रूरत आदि विभिन्न सरोकार इनकी रचनाओं में मौजूद हैं यानी एक अच्छे रचनाकार के लिए जिस फ़िक्र की ज़रूरत होती है, वो है इनके पास। फ़िक्र के साथ-साथ अपनी बात को सलीक़े से कहने का फ़न भी एक रचनाकार के लिए बेहद ज़रूरी है। यह फ़न एक ऐसी चीज़ है, जो समय के साथ निरन्तर अभ्यासरत रहकर धीरे-धीरे ही तराशा जा सकता है। इसे हासिल करने के लिए ये लगातार प्रयासरत हैं।

इनकी ग़ज़लों में वर्तमान दौर की सामाजिक और राजनीतिक विसंगतियों के प्रति रोष मिलता है और यह रोष आज लगभग हर चिंतनशील व्यक्ति के मन में है। जिस भौगोलिक क्षेत्र में जनमानस इतना विवेकहीन हो गया हो कि उसे सही-ग़लत का अंतर ही न पता हो, जिसमें विश्लेषण की क्षमता का नितान्त अभाव हो, वहाँ के लोगों से उम्मीद ही क्या लगाई जा सकती है!

बे-गुनाहों को यहाँ फ़ौरन हिरासत हो गयी
दोषियों की चंद लम्हों में ज़मानत हो गयी


जिसके पास धन-बल और पहुँच है, कानून उसकी जेब में है। यह बात हम सभी बेह्तर जानते हैं। यहाँ इस शेर में एक छटपटाहट है, एक गुस्सा है व्यवस्था के ख़िलाफ़। रचनाकार के मन में इन दो पंक्तियों के जन्म से बहुत पहले से कई अनुत्तरित प्रश्न हैं, जिन्होंने इस अफ़सोस जताते हुए शेर को जन्म दिया। शेर कोई सवाल नहीं करता, कोई नई बात नहीं बताता, बस स्थिति पर दुःख व्यक्त करता है।

ये नफ़रत का असर कब तक रहेगा
नगर सहमा हुआ कब तक रहेगा


यहाँ प्रश्न है। और रचनाकार इस बात से भी भली-भांति अवगत है कि उसके इस प्रश्न का उत्तर किसी के पास नहीं है। बस एक बदहवासी की स्थिति है, जो उसे बड़बड़ाने को बाध्य करती है।

दिलों के बीच में उनको खड़ी दीवार करने दो
हमें तो प्यार आता है, हमें बस प्यार करने दो


यहाँ उत्तर है। एक समझदारी भरा अच्छा निर्णय है। इसके सिवा अम्नपसन्द इंसान इस समय में कुछ नहीं कर सकता।

ऐसे छटपटाहट भरे शेर किताब में कई जगह दिखते हैं। लीजिए, एक और पढ़िए-


ज़मीनों और वसीयत के बहुत हक़दार मिलते हैं
मगर माँ-बाप बूढ़े-से, सदा लाचार मिलते हैं


अब इस हक़ीक़त से कौन वाक़िफ़ नहीं! हमारे आसपास की ही तो बात है। वे लोग जो माँ-बाप को 'यूज़लेस' समझते हैं, उनसे कतराते हैं, उनका हाल भी नहीं पूछते, वे ही माँ-बाप के गुज़रने के बाद 'माल' पाने के लिए दौड़ पड़ते हैं। दु:खद है यह स्थिति। अफ़सोसजनक है लेकिन हल बस यही है कि स्वार्थ से ऊपर उठ, मानवीय सम्वेदनाओं को ज़िन्दा रखा जाए।

इनके एक शेर में पर्यावरण की चिन्ता देखिए-

नदियाँ अपनी पावनता खो देती हैं
मिल जाते हैं जब गन्दे नाले साहब


सीधे अर्थ पर बात करें तो बहुत सच है कि शह्रों के नाले इन निर्मल नदियों को निर्मल कहाँ रहने देते हैं। ओमप्रकाश यती जी के शब्दों में 'सभ्यताओं को अपने किनारों पर जन्म देने वाली नदियाँ, इन्हीं सभ्यताओं की वज्ह से ख़तरे में है'।
इस शेर को दूसरे एंगल से देखने पर देश में बहुतायत में हो रही बलात्कार की घटनाएँ सामने आकर खड़ी हो जाती हैं। अपनी गंदगी भरी सोच लिए ये गन्दे नाले के समान पुरुष, मासूम बहन-बेटियों को दाग़दार कर उनकी ज़िन्दगी लील रहे हैं। यह शेर प्रतिरोध का न होकर एक बेबस, लाचारी भरी स्वीकृति का शेर है, जो सहज रूप से चुपचाप कह रहा है कि 'तुम्हारे होते हुए.....डूब मरो!'

कहीं-कहीं इनके अशआर में नसीहत, अनुभव, दर्शन आदि भी देखने को मिलते हैं। आराम से सुखी जीवन जीने का सीधा-सा तरीका बताता यह शेर देखिये-

काम रख तू सिर्फ अपने काम से
ज़िन्दगी कट जायेगी आराम से


अपने हमसफ़र के साथ और सहयोग के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करते हुए; उन्हें अपनी यह कृति समर्पित कर सुनीता जी कई अशआर भी उन्हें नज्र करती है। इनके इन मुहब्बत भरे अशआर में भी उनके प्रति स्नेहिल-आभार साफ़ झलकता है।

आज जो भी हूँ तुम्हारी ही वजह से ही तो हूँ
चल न पाती इक क़दम गर हौसला मिलता नहीं


इसी तरह का एक शेर, जो मुझे बहुत पसन्द आया। इसमें निहित भाव की मौलिकता आकर्षित करती है। ख़ुद को लता और साथी को पेड़ बताकर कितना प्यारा ख़याल पिरोया है!

मैं लता, पेड़ तुम हो मेरे हमसफ़र
मैं खड़ी कैसे होती सहारे बिना


रचनाकार जब तक एक परिपक्व अवस्था तक नहीं पहुँच जाता है, मैं समझता हूँ उसे अपनी रचनाओं पर किसी जानकार साथी से इस्लाह लेते रहना चाहिए। हालाँकि यह हर विधा के रचनाकार के लिए ज़रूरी है लेकिन एक ग़ज़लकार के लिए यह बात बेहद ज़रूरी है। बह्र पकड़ने के बाद एक अवधि तक भावों को तयशुदा मात्राओं में बाँधना, अपने मन की बात आसानी से कहन में उतारना, कुछ ऐब और छूटों को समझना; इन सबके लिए किसी के मार्गदर्शन की बहुत ज़रूरत होती है। इस्लाह के अभाव में अपनी रचनाओं में कई कमियों को हम सालों तक नहीं पकड़ पाते। सुनीता जी हालाँकि एक बहुत समर्थ ग़ज़लकार से जुड़ी रही हैं लेकिन इसके बावजूद भी इनके कई अशआर में सुधार की गुंजाइश दिखती है। खैर, ख़ूबियों को तराशने और कमियों को दूर करने के लिए एक उम्र पड़ी है। फ़िलहाल जो सबसे अच्छी बात है, वह यह कि इस रचनाकार में बेह्तरीन ग़ज़लकार होने की तमाम संभावनाएँ हैं।

यमुनानगर (हरियाणा) निवासी सुनीता जी ग़ज़ल के साथ-साथ गीत, हाइकु सहित कई छन्दों में भी लेखन करती हैं। इससे पहले इनका एक काव्य संग्रह 'अनुभूति' भी प्रकाशित हो चुका है। वहीं वे अपने ब्लॉग 'मन के मोती' पर भी बराबर सक्रीय हैं। परिवार और अध्यापन के बाद जो थोड़ा-बहुत समय हाथ आता है, वह किताबों और अपनी अभिव्यक्ति में ख़र्च होता है। अपनी व्यस्तताओं के बीच वे लगातार लेखन में सक्रीय है, यह भी संतोषप्रद है। मैं आशा करता हूँ कि भविष्य में भी इनकी सार्थक कृतियाँ हम लोगों तक पहुँचती रहेंगी।




समीक्ष्य पुस्तक- किनारे बोलते हैं
रचनाकार- सुनीता काम्बोज
विधा- ग़ज़ल
प्रकाशन- अयन प्रकाशन, महरौली, नई दिल्ली
संस्करण- प्रथम, 2017
पृष्ठ- 160
मूल्य- 300 रूपये (हार्डबाउंड)


- के. पी. अनमोल
 
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आवरण: अनामिका प्रतीक्षा

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