Hastaksher
प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
अगस्त 2017
अंक -29

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

मूल्यांकन

एक श्रेष्ठ कुण्डलिया संग्रह है 'लक्ष्मण की कुण्डलियाँ'- अमन चाँदपुरी
 



'लक्ष्मण की कुण्डलियाँ' जयपुर के वयोवृद्ध साहित्यकार लक्ष्मण रामानुज लड़ीवाला की दूसरी प्रकाशित पुस्तक है, जो कि एक कुण्डलियाँ संग्रह है। इसमें विविध विषयों पर 234 कुण्डलियाँ संकलित हैं। कुण्डलियाँ लेखन की परम्परा तो अत्यन्त प्राचीन है मगर कवियों में गिरिधर, जिन्होंने इसे स्थापित किया, के बाद कोई अन्य नाम दूर-दूर तक दिखाई नहीं देता। वर्तमान समय में कुण्डलियाँ लेखन पुनर्जीवित हो रहा है और कई बड़े नाम उभरकर सामने आए हैं, जिनमें त्रिलोक सिंह ठकुरेला, कपिल कुमार,  रामस्नेही लाल शर्मा 'यायावर', ग़ाफ़िल स्वामी, रघुविन्द्र यादव, शिवानन्द सिंह सहयोगी, डॉ. नलिन आदि प्रमुख हैं। इधर निरन्तर कुछ वर्षों से एकल एवं साझा कुण्डलियाँ संग्रह भी प्रकाशित होकर खासी चर्चा में रहे हैं।

लड़ीवाला जी की कुण्डलियों की भाषा सहज, सौम्य एवं सुन्दर है। कला पक्ष और भाव पक्ष दोनों ही सुसंगठित एवं श्रेष्ठ है। इनके लेखन ने लगभग हर विषय को स्पर्श किया है। इनकी कुण्डलियों में जीवन-दर्शन देखने को मिलता है। वर्तमान समाज में व्याप्त तमाम बुराइयों से इनका कवि मन जब व्यथित होता है तो इनकी लेखनी से अनायास ही कुण्डलियों की सृजना हो जाती है। नारियों का उत्पीड़न समाज में कैंसर की भाँति विकराल रूप धारण कर एक लाइलाज बिमारी बन चुका है। आज दुष्कर्म की घटनाएँ दिन-प्रतिदिन बढ़ती जा रही हैं, दुष्कर्म केवल तन का ही नहीं होता बल्कि तन से ज़्यादा मन को प्रभावित करता है। कवि लिखते हैं-


नारी पीड़ा सह रही, मन में है अवसाद।
संत वेश में घूमते, दुष्कर्मी आज़ाद।।
दुष्कर्मी आज़ाद, सताते नहीं अघाते,
करें नहीं परवाह, गंदगी भी फैलाते।
राजनीति का मंच, भरे अपराधी भारी,
हमको यही मलाल, कष्ट में अबला नारी।।


नारियों के इस उत्पीड़न के लिए कहीं न कहीं वो ख़ुद भी ज़िम्मेदार हैं। एक अन्य कुण्डलिया में वो डरी सहमी नारी को रणचंडी माँ दुर्गा का रूप धारण करने को भी कहते हैं, देखें-

नारी का अपमान हो, सारे व्यर्थ विधान।
मूक बने शासक जहाँ, बढ़े वहीं हैवान।।
बढ़े वहीं हैवान, नहीं रहती मर्यादा,
नारी क्यों बेजान, प्रश्न है सीधा सादा।
रखना अपना ध्यान, छोड़कर ये लाचारी।
लेकर दुर्गा रूप, करे परिवर्तन नारी।।


हर रचनाकार का सपना होता है कि उसकी भी एक पुस्तक हो। वो शुरुआत से ही एक-एक रचना जोड़कर वर्षों की कठिन साधना से एक पुस्तक की रचना करता है, उसे प्रकाशित कराता है। वो सपना निश्चित रूप से लड़ीवाला जी ने भी देखा होगा। तभी उन्होंने पुस्तक की महिमा एवं उसकी महत्ता का बखान करते हुए लिखा है-

पुस्तक में हरदम मिले, रंग-रंग के फूल।
बोझिल मन को कर सके, पुस्तक ही अनुकूल।।
पुस्तक ही अनुकूल, जोड़ लो उससे नाता,
उस पुस्तक को बाँच, जिसे पढ़कर रस आता।
कर लक्ष्मण सम्मान, ज्ञान में जिसके दमखम।
दे सकते उपदेश, पढ़े जो पुस्तक हरदम।।


राजा भगीरथ के अथक प्रयासों के बाद महादेव की जटा से होकर पुण्य भूमि भारत में उतरी गंगा, जिसे हम माँ गंगा का सम्बोधन देते हैं, शायद ही समस्त विश्व में कोई और नदी हो जिसे यह सम्बोधन मिला हो। वो आज जिस भाँति मैली हो गई है और होती जा रही है, यह बेहद दुखद है। 'राम तेरी गंगा मैली हो गई, पापियों के पाप धोते-धोते' जैसी ही अर्थ गम्भीरता लिए कवि की निम्न कुण्डलिया देखें-

माँ गंगा को सब कहें, जग में है अनमोल।
इसको मैली मत करो, सब संतों के बोल।।
सब संतों के बोल, भूल दूषित जल धारी,
किया घोर अपराध, तोड़ दी सीमा सारी।
निर्मल जल जन प्राण, रहे मन इससे चंगा।
करे सदा कल्याण, पतितपावन माँ गंगा।।


'साहित्य के कुछ ऐसे विषय हैं, जिन पर रचना किए बिना कोई कवि पूर्णत: कवि नहीं माना जाता।' ऐसा मेरा मानना है। उन्हीं में एक विषय है राजनीति, राजनीति पर कवि क्या कहते हैं, देखिए-

नेताजी बतला रहे, सेवक अपना नाम।
सावधान उनसे रहें, करें देश बदनाम।।
करें देश बदनाम, सदा वोटर को लूटें,
बनकर बगुला भक्त, पराए धन पर टूटें।
कह लक्ष्मण कविराय, भ्रष्ट जिनके आकाजी।
करते भ्रष्टाचार, सभी ऐसे नेताजी।।


आज कविता में नित्य नए प्रयोग हो रहे हैं। हिंदी में अन्य भाषाओं के प्रचलित शब्द चाहे वह उर्दू हों, अंग्रेजी हों, संस्कृत हों या कोई अन्य आसानी से ग्रहण कर लिए जाते हैं। जो कविता की श्रेष्ठता को बढ़ाकर पाठक का ध्यान आकर्षित करते हैं। लडीवाला जी ने भी अपनी कई कुंडलियों में बहुतायत-सी भाषा के शब्दों का सफल प्रयोग किया है-

होगा डिजिटल देश अब, मिले सभी को नेट।
टेबलेट भी हो अगर, भर दें सबका पेट।।
भर दें सबका पेट, कृषक की नहीं ज़रूरत,
जमे देश की धाक, जीत लें हम फिर कुदरत।
अव्वल होगा देश, जगत का यही दरोगा।
होंगे सभी अमीर, देश जब डिजिटल होगा।।


जीवन के 72 बसंत के साथ-साथ पतझड़ और मधुमास भी देख चुके लड़ीवाला जी की इन कुण्डलियों में जगह-जगह अनुप्रास, उपमा, रूपक, यमक एवं मानवीकरण आदि अंलकारों का भी यथोचित प्रयोग हुआ है, जो कि स्वत: ही आए प्रतीत होते हैं।

अन्तत: यही कहूँगा कि 'लक्ष्मण की कुण्डलियाँ' कुण्डलियाँ छंद का एक उत्कृष्ट संकलन है, जो आगे चलकर साहित्य में ध्रुव तारे के समान प्रकाशित रहेगा। मैं कवि को इस संग्रह के लिए हार्दिक बधाई देता हूँ। उम्मीद करता हूँ कि निकट भविष्य में भी इनके कुछ और  संग्रह देखने को मिलेंगे।






समीक्ष्य पुस्तक- लक्ष्मण की कुण्डलियाँ
रचनाकार- लक्ष्मण रामानुज लड़ीवाला
प्रकाशन- बोधि प्रकाशन, जयपुर
प्रथम संस्करण- दिसम्बर, 2016
पृष्ठ- 88
मूल्य- 100 रूपये मात्र


- अमन चाँदपुरी
 
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आवरण- राकेश रोहित

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