Hastaksher

सितम्बर - अक्टूबर 2019 (संयुक्तांक)
अंक - 53 | कुल अंक - 53
प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

मूल्याँकन

एक पर कटे पंछी-सा घायल एहसास
- रजनी छाबड़ा




कुछ समय पहले प्रिय मित्र नीलम पारीक से उनका प्रथम काव्य संग्रह ‘कहाँ है मेरा आकाश’ भेंट स्वरुप मिला। संग्रह में शामिल रचनाएँ मन को बाँध लेती हैं। पढ़ना शुरू किया तो सोचा था कि धीरे-धीरे सब कविताएँ पढ़ लूँगी; पर ऐसा नहीं हुआ। विचारों की रवानगी व सहज, सरल भावाभिव्यक्ति ने इतना प्रभावित किया कि पूरा संग्रह एक ही बार में पढ़ डाला। व्यस्तता के कारण चाहते हुए भी इस बारे में विचार व्यक्त नहीं कर पायी। आज मेरी फुर्सत के कुछ क्षण नीलम जी और उनकी काव्य कृति को समर्पित हैं।

इस काव्य संग्रह की कविताएँ प्रेम, त्याग, सामंजस्य, बचपन की मधुर यादें, प्रकृति प्रेम, समाज में पनप रही विसंगतियों के प्रति विरोध के स्वर व आक्रोश के स्वर मुखर करती हैं। बिना किसी दुरूहता के सहज ढंग से सरल भाषा में मन के भाव उकेरे गये हैं। कहीं-कहीं विदेशी भाषा के शब्द का प्रयोग, भावों की गहराई तक पहुँचाने में प्रभावी रहा है, जैसे कि 'haunted अतीत'।

कविता की रचना का मूल मन्त्र देती, नीलम जी की एक छोटी-सी कविता-


तितलियों के परों-सी
फूलों की पंखुड़ियों-सी
इत्र की महक-सी
हवा के परों पर सवार
कानों को छू जाएँ
वो बातें तो बन जाये कविता (पृष्ठ 31)


कुछ लीक से हट कर सोचती हैं कवयित्री महोदया-

समन्दर
कर के आत्मसात
अपने जल का खारापन
मित्र बादल के संग
भेज देता है
बहन धरा के घर
उसकी संतान के लिए
मधुर निर्मल जल
धन्य हो समन्दर तुम! (पृष्ठ 61)


धर्म और राजनीति के खेल से आहत, उनकी क़लम इस दर्द को कुछ यूँ बयान करती है-

बाँट लिये रंग
लोगों ने धर्म के नाम पर
राजनीति के नाम पर
हो गया खण्ड-खण्ड
इन्द्रधनुष (पृष्ठ 119)


कवयित्री सामाजिक ताने-बाने में खुद को उलझी हुई महसूस करती है और विक्षप्तियों के विरुद्ध अपनी आवाज़ उठाने का दम रखती है-

मैं तो ममतामयी हूँ, प्रेममयी हूँ, स्नेहमयी हूँ
मैं लक्ष्मी भी हूँ
सरस्वती भी
लेकिन मत भूलो
मैं काली भी बन सकती हूँ
और इस बार किसी महिषासुर के लिए नहीं, तुम्हारे लिए
मत करो विवश
मुझे छोड़ने को अपना नारीत्व (पृष्ठ 30)


संग्रह की शीर्षक कविता ने तो मन को गहरे से मथ दिया और पढ़ते ही मैंने इसका अंग्रेजी में व मेरे एक कवि मित्र ने फेसबुक पर कमेंट बॉक्स में ही मैथिली अनुवाद पोस्ट कर दिया।

माँ
तू तो कहती थी
बेटियाँ तो होती हैं चिड़ियाँ
पर माँ
चिड़ियाँ तो उडती हैं
खुले आकाश में
मैं चिड़िया हूँ तो
कहाँ हैं मेरा आकाश? (पृष्ठ 87)


ईश्वर से प्रार्थना हैं कि नवोदित कवयित्री नीलम पारीक साहित्य जगत में कामयाबी के शिखर पर पहुंचे, उन शिक्षा रूपी पखों की उड़ान से जो उनके मम्मी-पापा से उन्हें मिले और आकाश में उड़ने का हौंसला भी।





समीक्ष्य पुस्तक- कहाँ है मेरा आकाश
रचनाकार- नीलम पारीक
विधा- कविता
प्रकाशक- बोधि प्रकाशन, जयपुर
मूल्य- रु. 120/- (पेपर बेक)


- रजनी छाबड़ा

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